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Saturday, February 27, 2021

ज़िंदा है शिव भावना: ज़हर पी कर भी अमृत बांटना

मोरक्को मूल की एक फ्रांसीसी महिला लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन का कमाल 


26 फरवरी 2021//
शांति और सुरक्षा 

वक़्त के साथ ज़ख्म तो भर जाते हैं लेकिन दर्द कम नहीं होता। इस हकीकत  के बावजूद कई इंसान सामने आते हैं दर्द को ही दवा बनाने का चमत्कार कर दिखाया। मोरक्को मूल की एक फ्रांसीसी महिला लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन को, युवाओं में अतिवाद का मुक़ाबला करने प्रयासों में, असाधारण साहस दिखाने के लिये पुरस्कृत किया गया है, जिनका बेटा, लगभग एक दशक पहले, एक आतंकवादी हमले में मौत के मुँह में धकेल दिया गया था।  ये महिला अपने इस अथाह दुख को, ’प्रेम की पुकार’ से भरने की कोशिशों में सक्रिय हैं। पुरस्कार ऐसे लोगों  करने की है। इन राहों पर कदम बढ़ाने की हिम्मत मिलती है ऐसे इंसानों के बारे में पढ़ सुन कर। संयुक्त राष्ट्र समाचारों के बहादुर महिला की चर्चा हो रही है। 

 गौरतलब है कि लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन को मानव बन्धुत्व के लिये ज़ायद पुरस्कार से संयुक्त रूप से सम्मानित किया गया है. उन्हें ये पुरस्कार, फ़रवरी 2021 के आरम्भ में, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश के साथ मिला है।

उल्लेखनीय है कि लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन का 30 वर्षीय बेटा इमाद, फ्रांसीसी सेना में, एक पैराट्रूपर था। मानवता को बचने के लिए अपनी डयूटी करता हुआ एक सैनिक।  था कि आतंकवादी उसकी अभियान को लेकर सक्रिय हैं उसमें उसकी हत्या भी है। 

आखिर वह मनहूस समय आ गया जब उसका सामना मौत से होना था। मार्च 2012 में, फ्रांस के दक्षिणी हिस्से में, एक आतंकवादी मोहम्मद मेराह ने, नौ दिनों तक चलाए गए अपने हत्याअभियान में, 7 लोगों को मौत के मुँह में धकेल दिया था, लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन का बेटा इमाद भी जान गँवाने वालों में था। सदमा बहुत बड़ा था। सम्भलना नामुमकिन था लेकिन इस बहादुर औरत ने कमाल की हिम्मत दिखाई। नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया। उसने दर्द की  लिया। जिस आतंकवाद से इतना बड़ा सदमा मिला था उसके खिलाफ शांति और सहनशीलता का  लिया। 

लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन ने अपने बेटे इमाद की मौत के, लगभग एक महीने के भीतर ही, ‘इमाद एसोसिएशन फ़ॉर यूथ एण्ड पीस’ की स्थापना कर डाली. ये संगठन सहनशीलता और शान्ति को बढ़ावा देता है। आतंकवाद की सोच के खिलाफ यह बहुत बड़ा कदम था। सचमुच एक बहादुरी भरा कदम। हिंसा करने वाले दिलों पर शांति की बरसात। अमन के सौहार्द भरे अमृत  की बौछार। 

शुरुआत छोटी सी थी। व्यक्तिगत प्रयास जैसी। इसके बावजूद इसे तेज़ी से समर्थन मिलने लगा। उसके बाद से तो लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन ने युवाओं को विद्रोही और अतिवादी बनने से रोकने के लिये, फ्रांस में और विदेश में, परिवारों और समुदायों के साथ मिलकर काम किया है. इन प्रयासों के तहत वो, शान्ति, सम्वाद और आपसी सम्मान का पैग़ाम फैला रही हैं। दुनिया भर में उसकी चर्चा हो रही है। आतंक और हिंसा के गहन अँधेरे में यह बहादुर औरत रौशनी की एक किरण बन कर उभरी है। भटके हुए लोगों को रास्ता दिखाती हुई दिव्य सोच वाली बहादुर औरत। 

वास्तव में यह घटनाक्रम बेहद कठिन राहों पर एक दुखी मां का सफ़र था। लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन ने, यूएन न्यूज़ अरबी भाषा के सहयोगियों के साथ बातचीत में याद करते हुए हुए बताया कि उन्होंने किस तरह उस शहर ताउलाउज़ की यात्रा की, जहाँ उनके बेटे इमाद की हत्या की गई थी, दुख का पहाड़ टूट पड़ने की वजह तलाश करने की ख़ातिर। अपने ही ज़ख्मों को स्वयं कुरेदने जैसी थी यह यात्रा। 

जब उसने अपने बेटे का खून देखा तो वे पल बेहद दर्द थे भरे थे जिसका अहसास खून बहाने वालों को हो ही नहीं  सकता। लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन बताती हैं, “मैंने अपने घुटनों पर झुककर देखने की कोशिश की. मुझे ज़मीन पर उसका (अपने बेटे का) रक्त पड़ा हुआ नज़र आया। मैंने अपने हाथों में मिट्टी भरी और अपने बेटे के रक्त को रगड़ते हुए, दुआ माँगी, ‘ओ मेरे ख़ुदा, मेरी मदद कर, या मेरे ख़ुदा.’ मैं दहाड़ मारकर चीख पड़ी।”

दर्द का पहाड़ उस पर टूट पड़ा था। आंसूओं का एक सैलाब अंतर्मन  से आंखों के ज़रिए बाहर आ रहा था। दुख और सदमे का सामना कर रही इस माँ का दर्द उस समय तब और बढ़ गया जब उन्होंने ये देखा…वे पल आज भी आँखों को भिगो देते हैं।  इन भीगी आंखों में आंसू और दिल में दर्द ही दर्द लेकर वह उस इलाके में भी पहुंची जहां कभी उसके बेटे के हत्यारे का निवास रहा था। 

लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन ताउलाउज़ शहर की पूर्वोत्तर बस्ती लेस इज़ार्द्स में थीं, जहाँ उनके बेटे के हत्यारे ने परवरिश पाई थी, और जहाँ एक पुलिस कार्रवाई में, उस हत्यारे के जीवन का भी अन्त हो गया था। लेकिन लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन इस सब से अनजान थी। 

इस लिए लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन ने, वहाँ रास्तों पर यूँ ही भटक रहे या समय काट रहे कुछ युवाओं को देखा तो उनके पास जाकर पूँछा कि मोहम्मद मेराह कहाँ रहता था। उसका सवाल सुन कर वे लोग हैरान थे। उनकी आंखों और  चेहरे पर अजीब सी रहस्यमय  मुस्कान उभर आती। 

अजीब सी स्थिति थी। उन युवाओं में से एक ने, कुछ रहस्यमयी मुस्कान दिखाई, तो लतीफ़ा को ख़ुद पर ही कुछ अचरज हुआ कि उनके सवाल में क्या कोई अजीब बात थी। 

अल्पकाल के लिए रुकी हुई बात को आगे बढ़ाते हुए “उस युवा ने कहा, ‘लेकिन क्या आप टेलीविज़न नहीं देखती हैं? मैडम, क्या आप अख़बार नहीं पढ़ती हैं? मैंने कहा, कृपया, मैं पूछ रही हूँ कि मोहम्मद मेराह कहाँ रहता था? उसने मुझे बताया: मोहम्मद मेरा एक शहीद है. इस्लाम का एक हीरो. उसने फ्रांस को घुटनों पर झुका दिया!’”

यह सब आसान नहीं था लेकिन दुख तकलीफ़ से निकलकर ही आगे बढ़ा जा सकता था। इस बहादुर औरत ने  यही किया। 

आतंक के दिन याद आते ही आज भी दर्द जाग उठता है। मोहम्मद मेराह के क़ातिलाना वहशीपने ने देश को हिलाकर रख दिया था। उसने ताऊलाउज़ शहर और पास के माउंटाउबन में अन्धाधुन्ध गोलियाँ चलाकर जिस पहले व्यक्ति को मौत के मुँह में धकेला, वो इमाद इब्न ज़ायतेन ही था। मोहम्मद मेराह ने वर्ष 2012 में 11 से 19 मार्च तक ये गोलीबारी की थी। उसने कितने ही घरों के चिराग बुझा दिए। 

न जाने कितने घरों में अँधेरा किया उसने। उसके वहशीपने का शिकार होने वालों में दो अन्य सैनिक थे जो उस समय ड्यूटी पर नहीं थे. एक यहूदी स्कूल में एक रब्बाई (यहूदी धार्मिक प्रचारक या शिक्षक) और तीन बच्चे भी मोहम्मद मेराह की गोलियाँ का शिकार हुए. पाँच लोग घायल भी हुए थे। 

इमाद इब्न ज़ायतेन की ही तरह, मोहम्मद मेराह भी, एक आप्रवासी परिवार का बेटा था. लेकिन इन आप्रवासी परिवारों में से एक के बेटे (इमाद) ने देश की सेवा करने का रास्ता चुना, जबकि दूसरे परिवार के बेटे (मोहम्मद मेराह) ने आतंकवाद की राह पकड़ी।  


लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन इसकी वजह पर ध्यान खींचते हुए कहती हैं, “दुख के साथ कहना पड़ता है कि कुछ युवाओं के पास शिक्षा नहीं है, उन्हें माता-पिता की मौजूदगी नहीं मिली है, उन्हें कोई मददगार और सहारा देने वाला माहौल नहीं मिला है।” इस लिए शिक्षा और रहनसहन दोनों की तरफ ध्यान देना होगा। 

इसके साथ ही उन्होंने आगे कहा कि ये युवा भटके हुए हैं और हमें उन्हें सही रास्ते पर लाना है, हमें उनके साथ मिलकर काम करना ही होगा। शायद यही है एकमात्र मार्ग। 

“हमें इन युवाओं के साथ सम्पर्क और सम्वाद स्थापित करना ही होगा, क्योंकि वो ही तो भविष्य हैं।”

सहनशीलता का सन्देश देने के लिए लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन ने ये काम उस संगठन के माध्यम से करने का बीड़ा उठाया है जो उनके दिवंगत बेटे के नाम पर बनाया गया है। यह संगठन  सक्रिय। है। 

इसी मिशन को लेकर वो फ्रांस में अनेक इलाक़ों का दौरा करके, सहनशीलता का सन्देश फैला रही हैं। वो हाई स्कूलों के छात्रों, अभिभावकों और अन्य लोगों तक पहुँचकर, अपनी बात कह रही हैं। इनमें बहुत से अध्यापक और जेलों के निदेशक भी हैं जो उनके पास ये सन्देश फैलाने का अनुरोध लेकर आते हैं। इस संगठन के कार्य तेज़ी से बढ़ते जा रहे हैं। 

इस यादगारी अवसर पर यूएन प्रमुख एंतोनियो गुटेरेश ने भी ये पुरस्कार संयुक्त रूप से स्वीकार करते हुए एक वक्तव्य में, 5 बच्चों की माँ लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन के प्रयासों को सराहा। उन्होंने कहा कि लतीफ़ा ने, अत्यन्त गम्भीर निजी सदमे से उबरकर, युवा लोगों को सहारा व समर्थन देने और आपसी समझदारी को बढ़ावा देने के समर्पित प्रयासों की बदौलत, देश-दुनिया में, वाह-वाही बटोरी है। उसके प्रयासों से बहुत से लोगों ने प्रेरणा पाई है। अमन शांति का यह काफिला दिन प्रति दिन मज़बूत होता जा रहा है। 

सुन्दर सपने देखें-इससे शक्ति मिलेगी। सुंदर सपनों  को देखना भी शक्ति अर्जित  करने जैसा ही है।  लतीफ़ा ने एक ऐसे युवा के साथ अपनी मुलाक़ात को याद किया जिसने कहा था कि वो एक ऐसी धरती पर भी उपेक्षित और अलग-थलग महसूस करता है जिसका नारा ही स्वतन्त्रता, समानता और बन्धुत्व है। लतीफ़ा ने उस युवक से कहा कि वो किस तरह एक बन्धुत्व वाले और सामुदायिक फ्रांस का निर्माण करने का सपना देखती हैं, जहाँ हर किसी के लिये अपनी एक जगह हो। इसी धरती  को स्वर्ग बनाने के प्रयासों में तेज़ी लानी होगी। 

युवाओं को आतंकवाद  के जाल में फंसने से रोकना होगा। लतीफ़ा ने उस युवक को कुछ ऐसी सलाह भी दी ताकि वो, मोहम्मद मेराह की तरह, अतिवाद के जाल में ना फँस जाएँ। 

लतीफ़ा ने कहा, “अपने हालात का पन्ना पलटने की कोशिश करो, पढ़ाई करो. किसी ख़ूबसूरत चीज़ के बारे में कोई सपना देखो... और जब तुम इबादत करो, तो अमन-चैन के लिये दुआ माँगो; मुहब्बत की दुआ.”

(जानकारी एवं तस्वीरें संयुक्त  राष्ट्र समाचार से साभार  Input- वीमेन स्क्रीन डेस्क डेस्क)

Tuesday, January 12, 2021

म्हारी दिलेर दादी, ताई-काकी-सब मैदान में हैं

  किसान आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभा रही है नारी शक्ति  


सोशल मीडिया
: 12 जनवरी 2021: (वीमेन स्क्रीन डेस्क)::

प्राग पाठक उत्तरप्रदेश के जहांगीरा बाद से सबंधित हैं लेकिन आजकल नोयडा में रह रहे हैं। मेरी उनसे जान पहचान भी नहीं लेकिन किसी न किसी बहाने सोशलमीडिया के किसी न किसी मंच पर उनकी कोई न कोई पोस्ट मिल जाती है जो सोचने को मजबूर करती है। कुछ वर्ष पूर्व सत्ता बदली तो बहुत से लोग सत्ता वालों के पीछे हो लिए। धर्म-कर्म-सिद्धांत सब ताक पर रख कर बस अंध भक्ति करना ही उनका सबसे पहला काम बन गया। ऐसे कलियुगी चलन के बावजूद जो लोग नहीं बदले उनमें प्राग पाठक भी शामिल हैं। गर्व से अपने नाम के साथ ब्रेक्ट में ब्राह्मण लिखते हैं लेकिन विश्वास मानवता में है। अंध भक्तों के खिलाफ तर्कपूर्ण अभियान चलाने वालों में वह बहुत सक्रिय हैं। मामला ट्रम्प की आवभगत का हो या कोई और वह ऐसे तर्क निकालते हैं कि अंधभक्त उसका कोई जवाब ही नहीं दे पाते। आजकल प्राग पाठक खुल कर किसान आंदोलन के साथ हैं। उन्होंने एक ऐसी तस्वीर पोस्ट की है जो नारी शक्ति के मौजूदा रूप और शक्ति को दिखाती है। जो मनुवादी लोग महिला को पूजा में देवी मानते हैं लेकिन में केवल  बच्चे पैदा करने वाली मशीन साबित करने पर तुले रहते हैं और अक्सर कहते हैं कि महिला का काम केवल घर के चौंके चूल्हे तक है उनकी ऑंखें खोलने के लिए प्राग पाठक साहिब ने एक तस्वीर पोस्ट की है महिलाओं की जो ट्रैक्टर चलाते हुए किसानों के समर्थन में सड़कों पर  उत्तर आई हैं। महिलाओं की इस तस्वीर के साथ पराग पाठक साहिब ने कुछ पंक्तिया भी दी हैं जिन्हें पत्रकारिता में कैप्शन कहा जाता है।  पंक्तियों में वह लिखते हैं: 

रसोई चलावे,

सरकार बणावें

जहाज उड़ावे

ट्रैक्टर-कार दौड़ावे

बात जब हक पे आवे,

म्हारी दिलेर दादी, ताई-काकी

साथ खड़ी मैदान भी पावे


Friday, January 1, 2021

भाजपा ने पंजाब में फिर शुरू की सक्रिय विपक्ष की भूमिका

Friday: 1st January 2021 at 6:58 PM

   ईसेवाल सामूहिक बलात्कार मुद्दे पर फिर घेरा सरकार को   


लुधियाना
: 1 जनवरी 2020: (वीमेन स्क्रीन ब्यूरो):: 

किसान आंदोलन को लेकर उलझे हुए  बावजूद भारतीय जनता पार्टी ने अन्य मुद्दों की तरफ ध्यान देना बंद नहीं किया। दूसरी मुश्किलों के  महिला मुद्दे उठा कर भाजपा ने अपना संघर्षमय विपक्ष वाला रूप भी फिर से दिखाना शुरू कर दिया है। आज भाजपा नेताओं ने बाकायदा एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करके ईसेवाल गांव में हुए सामूहिक बलात्कार के मुद्दे को भी फिर से उठाया।  महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधिक मामलों की जांच धीमी रफ्तार से करने और उनकी गरिमा की रक्षा करने में विफल रहने को लेकर भाजपा ने कैप्टन सरकार पर जम कर हमला बोला। आने वाले दिनों में ऐसे ऐक्शन बढ़ाए भी। 

     बहुचर्चित ईसेवाल सामूहिक बलात्कार मामले की चर्चा करते हुए प्रदेश भाजपा महासचिव जीवन गुप्ता ने इस सामूहिक गैंगरेप मामले में मुख्य आरोपी जगरूप सिंह को जमानत मिलने पर तीखी प्रतिक्रिया दी और कहा कि इस सब के लिए राज्य के एडवोकेट जनरल के कार्यालय ही मुख्यता जिम्मेदार है। इस मामले में मुख्य आरोपी जगरूप सिंह के साथ चार अन्य लोगों :- सादिक अली, अजय उर्फ बृज नंदन, सैफ अली और सुरमू–तथा एक अन्य जिस पर जुवेनाइल एक्ट के अधीन अलग से मुकदमा चलाया जा रहा है, को भी गिरफ्तार किया गया था । पांचों आरोपियों पर रश्मि शर्मा, जज स्पेशल कोर्ट-कम-अपर सेशन जज की अदालत में 15 मामलों में आरोप लगाए गए हैं, जिसमें गैंगरेप, जबरन वसूली, गलत तरीके से ज़मानत दिलवाने और अन्य अपराध शामिल हैं। इस तरह इस मुद्दे पर चर्चा  गई है। 

        इसके साथ ही उन्होंने कहा कि लुधियाना जिले के ईसेवल गांव की 20 वर्षीय पीड़ित लड़की अपने और अपने परिवार के सदस्यों सहित गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियों का सामना कर रही है। गुप्ता ने कहा, "ऐसे अपराधियों को जमानत मिलना बहुत ही चौंकाने वाला व दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि इन अभियुक्तों पर कई अपराधिक मामले दर्ज हैं।

       श्री गुप्ता ने महाधिवक्ता कार्यालय के खराब प्रदर्शन के लिए मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को जिम्मेदार ठहराया और मांग की कि राज्य की न्यायिक मशीनरी गैंगरेप पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए तत्काल कार्रवाई करे। उन्होंने कहा कि अगर राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में केस नहीं लड़ती है तो यह पंजाब में सरकार द्वारा अपराधियों का मनोबल बढ़ाना होगा।  

Thursday, December 31, 2020

लड़कियां: जन्‍म के साथ भी जन्म के बाद भी भेदभाव का सिलसिला जारी

 23-जनवरी-2017 19:35 IST

विशेष लेख//राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाना//बरनाली दास

Pexels Photo by Anete Lusina
देश कल राष्‍ट्रीय बालिका दिवस मनाने जा रहा है। प्रत्‍येक वर्ष 24 जनवरी को हम बालिका दिवस मनाते हैं, समाज में बालिकाओं के लिए समान स्थिति और स्‍थान स्‍वीकार करते है और एक साथ मिलकर हमारे समाज में बालिकाओं के साथ हो रहे भेदभाव और असमानता के विरूद्ध संघर्ष का संकल्‍प लेते हैं।

लेकिन यह बहुत दुर्भाग्‍यपूर्ण और अत्‍यधिक चिंता का विषय है कि देश में वर्ष 1961 से ही बाल लिंग अनुपात तेजी से गिरता रहा है। हम वर्ष 2017 में है और 21वीं शताब्‍दी के दूसरे दशक को पूरा करने जा रहे है, लेकिन हम विचारधारा को बदलने में सफल नहीं हुए है।

एक शिक्षित, आर्थिक रूप से स्‍वतंत्र महिला और कार्य स्‍थल तथा घर में सम्‍मानित महिला के लिए यह वास्‍तविकता जानकर कठिनाई होती है कि भारतीय समाज में सभी वर्गों में बड़ी संख्‍या में लोग बेटा होने की इच्‍छा रखते हैं और नहीं चाहते कि उन्‍हें बेटी हो। ऐसे लोग भ्रूण हत्‍या की सीमा तक जाते हैं।

विभिन्‍न क्षेत्रों में कुछ लड़कियों द्वारा ऊंची उपलब्धि हासिल करने के बावजूद भारत में जन्‍म लेने वाली अधिकतर लड़कियों के लिए यह कठोर वास्‍तविकता है कि लड़कियां शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य जैसे बुनियादी अधिकारों और बाल विवाह से सुरक्षा के अधिकार से वंचित हैं। परिणामस्‍वरूप, आर्थिक रूप से सशक्‍त नहीं है, प्रताड़ित और हिंसा की शिकार हैं। जनगणना आंकड़ों के अनुसार बाल लिंग अनुपात (सीएसआर) 1991 के 945 से गिरकर 2001 में 927 हो गया और इसमें फिर 2011 में गिरावट आई और बाल लिंग अनुपात 918 रह गया। यह महिलाओं के कमजोर होने का प्रमुख सूचक है, क्‍योंकि यह दिखाता है कि लिंग आधारित चयन के माध्‍यम से जन्‍म से पहले भी लड़कियों के साथ भेदभाव किया जाता है और जन्‍म के बाद भी भेदभाव का सिलसिला जारी रहता है।

लड़कियों के साथ व्‍यापक स्‍तर पर सामाजिक भेदभाव तथा नैदानिक उपायों की उपलब्‍धता और दुरूपयोग दोनों के कारण बाल लिंग अनुपात (सीएसआर) में कमी आई है। इस वास्‍तविकता से निपटना था और परिणामस्‍वरूप बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ (बीबीबीपी) योजना लागू की गई है। यह योजना विभिन्‍न क्षेत्रों में पूरे देश में विचार विमर्श के बाद तैयार की गई है। 

22 जनवरी, 2015 को हरियाणा के पानीपत में प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी द्वारा लॉन्‍च की गई बीबीबीपी योजना का प्राथमिक लक्ष्‍य बाल लिंग अनुपात में सुधार करना तथा महिला सशक्तिकरण से जुड़े अन्‍य विषयों का समाधान करना है। दो वर्ष पुरानी यह योजना तीन मंत्रालयों-महिला तथा बाल विकास मंत्रालय, स्‍वास्‍थ्‍य और परिवार कल्‍याण मंत्रालय तथा मानव संसाधान तथा विकास मंत्रालय द्वारा संचालित है। महिला तथा बाल विकास मंत्रालय नोडल मंत्रालय है। यह योजना अनूठी है और मनोदशा रिवाजों तथा भारतीय समाज में पितृसत्‍ता की मान्‍यताओं को चुनौती देती है।

Pexels-Photo by Vladi karpovich
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना को लागू करने के लिए बहुक्षेत्रीय रणनीति अपनाई गई है। इसमें लोगों की सोच को बदलने के लिए राष्‍ट्रव्‍यापी अभियान चलाना स्‍थानीय नवाचारी उपायों से समुदाय तक पहंचने पर बल देना, केन्‍द्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय द्वारा गर्भ पूर्व तथा जन्‍म पूर्व नैदानिक तकनीकी अधिनियम लागू करना और स्‍कूलों में लड़कियों के अनुकूल संरचना बनाकर बालिका शिक्षा को प्रोत्‍साहित करना तथा शिक्षा के अधिकार को कारगर ढंग से लागू करना शामिल है। शुरू में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना देश के सौ जिलों में लागू की गई। पिछले एक वर्ष में रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा, डिजिटल मीडिया तथा सोशल मीडिया सहित विभिन्‍न मीडिया में कार्यक्रम को लेकर अभियान चलाने से जागरूकता बढ़ी है। इस अभियान के तहत सामूहिक सामुदायिक कार्य और उत्‍सवों का आयोजन किया गया जैसे लड़की का जन्‍मदिन मनाना, साधारण तरीके से विवाह को बढ़ावा देना, महिलाओं के संपत्ति के अधिकार को समर्थन देना, सामाजिक तौर-तरीकों को चुनौती देने वाले स्‍थानीय चैम्पियनों को पुरस्‍कृत करना और युवाओं तथा लड़कों को शामिल‍ किया गया।

विभिन्‍न स्‍तरों पर ग्राम पंचायतों के माध्‍यम से लोगों से संवाद किया गया। बातचीत में प्रत्‍यायित सामाजिक स्‍वास्‍थ्‍य कार्यकर्ता (आशा), आंगनवाड़ी कार्यकर्ता (एडब्‍ल्‍यूडब्‍ल्‍यू) ऑक्‍सीलियरी नर्सिंग मिडवाइफ (एएनएम) तथा स्‍वयं सहायता समूह के सदस्‍यों, निर्वाचित प्रतिनिधियों, धार्मिक नेताओें और समुदाय के नेताओं को शामिल किया गया।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान को व्‍यापक बनाने के लिए, विशेषकर युवाओं में व्‍यापकता के लिए सोशल मीडिया प्‍लेटफॉर्मों का भी इस्‍तेमाल किया गया और  जन साधारण में बालिका के महत्‍व को लेकर सार्थक संदेश दिेये गये।

बे‍टी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना के क्रियान्‍वयन के दूसरे वर्ष में गर्भ पूर्व तथा जन्‍म पूर्व नैदानिक तकनीकी अधिनियम को कठोरता से लागू करने पर ध्‍यान दिया जा रहा है और  मानव संसाधन विकास मंत्रालय लड़कियों की शिक्षा पर विशेष रूप से फोकस कर रहा है। गर्भावस्‍था के पंजीकरण, संस्‍थागत डिलीवरी तथा जन्‍म पंजीकरण जैसे उपायों पर भी बल दिया जा रहा है।

अभी देश के 161 जिलों में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना चलाई जा रही है। सौ जिलों से मिली प्रारंभिक रिपोर्ट संतोषपद्र है। यह संकेत मिलता है कि अप्रैल-मार्च 2014-15 तथा 2015-16 के बीच 58 बीबीबीपी जिलों में बाल लिंग अनुपात को लेकर समझदारी बढ़ी। 69 जिलों में त्रैमासिक पंजीकरण में बढ़ोतरी हुई और पिछले वर्ष की कुल डिलीवरी की तुलना में 80 जिलों में संस्‍थागत डिलीवरी में सुधार हुआ। हरियाणा में दिसम्‍बर, 2016 में दो दशकों में पहली बार जन्‍म पर लिंग अनुपात 900 पर पहुंचा।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के विभिन्‍न हितधारकों को सतत रूप से सक्रिय बनाए रखने के लिए महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा सिविल सोसाइटी, अंतर्राष्‍ट्रीय संगठनों और औद्योगिक संघों को भागीदार बनाया गया। इससे नागरिक समाज के संगठनों को अपने कार्यों को बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना से जोड़ने के लिए प्रेरणा मिली।

भारत में बालिका के भविष्‍य के लिए बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना अत्‍याधिक महत्‍वपूर्ण और सफल योजना है। पहले वर्ष की सफलता से दिखता है कि देश में विपरीत बाल लिंग अनुपात को समाप्‍त करना सभी के सहयोग से संभव है।

* लेखक स्‍वतंत्र पत्रकार हैं और अभी एसओएस चिल्‍ड्रर्न विलिजेज ऑफ इंडिया में कम्‍युनिकेशन प्रमुख हैं। वह महिला और बाल विकास मंत्रालय की बीबीबीपी की कार्यक्रम प्रबंधन ईकाई के सहयोग को स्‍वीकार करती हैं।

*****वीके/एजी/जीआरएस -06

Wednesday, December 30, 2020

नारी शक्ति:गुमनामी की ज़िंदगी से शक्ति केंद्र तक का सफल सफर

 07-मार्च-2017 11:15 IST

विशेष लेख//तांकि महिला दिवस आने तक सभी के लिए विशेष अभियान चल सके 

                                                                                                                       *अनुपमा जैन

नारी संघर्ष की प्रतीकत्मक तस्वीर 


स्त्री शक्ति के जरिये परिवार,समाज और राष्ट्र को सशक्त तथा समृद्ध बनाने की राजस्थान की विभिन्न कल्याण योजनाओ से लगभग डेढ करोड़ परिवार की महिलाओ के'पॉवरफुल वुमेंन' बनने की दिशा में एक सकारात्‍मक कदम है। गुमनाम सी अंधेरी जिंदगी जी रही जयपुर की केसर देवी, बीकानेर की नानू देवी  जैसी लाखों महिलाओं को 'भामाशाह योजना' के तहत परिवार की मुखिया बना कर उन्‍हें अधिकार सम्पन्न बनाने से उनके परिवार लाभान्वित हो रहे हैं। 

लेखिका अनुपमा जैन 

दरअसल राजस्थान में इन दिनो महिला सशक्तिकरण को लेकर क्रांति हो रही है। प्रदेश की 'भामाशाह योजना' से दूर दराज के गांव, शहर की महिलायें 'पॉवरफुल वुमेंन' बन रही है। इसका अर्थ यह है कि अब लगभग एक करोड़ 30 लाख परिवारों के अहम फैसलों में मुखिया होने के नाते उनकी भूमिका खास बनती जा रही है। इस योजना के तहत आवश्यक जानकारियों के सत्यापन के बाद परिवार की महिला मुखिया के नाम से बहु उद्देशीय भामाशाह परिवार कार्ड बनाया जाता है। जानकारों का मानना है कि देश में महिला और उनके वित्तीय सशक्तीकरण की सबसे बड़ी भामाशाह योजना से राजस्थान में­ महिला आत्मनिर्भरता के एक नये युग का सूत्रपात हो रहा है। मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे का यह 'ड्रीम प्रोजेक्ट' है जिसके तहत महिलाओं को परिवार की मुखिया बना सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत मिलने वाले नगद लाभ सीधे उनके बैंक खातों में जमा करवाने और गैर नगद लाभ दिलवाने की अभिनव पहल है। भामाशाह योजना शुरू होने से राजस्थान में युगान्तरकारी परिवर्तन होने जा रहा है। यह योजना देश में अपनी तरह की पहली सीधी लाभ हस्तान्तरण योजना है।   

खास बात यह है कि भामाशाह योजना में राज्य के सभी परिवार अपना नामांकन करवा सकते हैं। भामाशाह योजना में नामांकन और भामाशाह कार्ड बनवाने को लेकर लोगों में अक्सर यह भ्रान्ति रहती है कि यह सुविधा केवल बीपीएल, बीपीएल महिला या किसी वर्ग विशेष के लिए है, जबकि वास्तविकता में इस योजना में राज्य के सभी परिवार अपना नामांकन करा सकते है। साथ ही यदि नामांकन में­ कोई त्रुटि अथवा अपूर्णता रह जाती है तो उसे संशोधित भी करवाया जा सकता है। इसी प्रकार भामाशाह कार्ड की यह विशेषता है कि यदि कार्ड गुम जाए अथवा चोरी हो जाता है तो भी कोई इसका दुरूपयोग नही कर पाएगा। चूंकि भामाशाह कार्ड बायोमैट्रिक पहचान सहित कोर बैंकिंग सुविधा युक्त है अतः यह पूरी तरह सुरक्षित है और लाभार्थी के खाते में जमा राशि उसके अलावा अन्य किसी के द्वारा निकालना संभव नही है। नामांकित परिवारों को संबंधित ग्राम पंचायत/शहरी निकाय के माध्यम से भामाशाह कार्ड निःशुल्क देने का प्रावधान है। सूत्रो के अनुसार  ऐसे परिवार जिनका भामाशाह योजना में ­ नामांकन होना है अथवा जिन्हे भामाशाह कार्ड जारी नही हुआ है उन परिवारों अथवा सदस्यों को सभी राजकीय सेवाएं आगामी आदेश तक पूर्व की तरह ही मिलती रहें­गी।

     राज्य सरकार द्वारा भामाशाह योजना में­ आवश्यक बदलाव कर इसे अधिक बड़े रूप में­ और अधिक व्यापक स्तर पर लागू किया जा रहा है और इसे प्रधानमंत्री की जन-धन योजना से भी जोड़ा गया है। भामाशाह योजना का उद्देश्य सभी राजकीय योजनाओं के नगद एवं गैर नगद लाभ सीधा पारदर्शी रुप से प्रत्येक लाभार्थी को पहुंचाना है। यह योजना के अंतर्गत राशन कार्ड, पेन्शन, उच्च एवं तकनीकी शिक्षा के लिए छात्रावृत्ति पाने वाले लाभार्थियों को भी सम्मिलित किया जायेगा। यह योजना परिवार को आधार मानकर उनके वित्तीय समावेश के लक्ष्य को पूरा करती है और इसके तहत हर परिवार को भामाशाह कार्ड दिया जाएगा जो उनके बैंक खातों से जुड़े होंगे। यह बैंक खाता परिवार की मुखिया,जो कि महिला होगी के नाम से होगा और वह ही इस खाते की राशि को परिवार के उचित उपयोग में­ कर सकेगी। यह कार्ड बायो-मैट्रिक पहचान सहित कोर बैकिंग को सुनिश्चित करता है। इसके अन्तर्गत, प्रत्येक परिवार का सत्यापन किया जाएगा और पूरे राज्य का एक समग्र डेटाबेस बनाया जाएगा। इसके माध्यम से जाली कार्डों की भी जांच की जाएगी। विभिन्न विभागों द्वारा पात्राता के लिए सभी जनसांख्यिकी और सामाजिक मापदण्डों को भी इसमें सम्मिलित किया जाएगा। 

     आधिकारिक आंकड़ो के अनुसार अब तक राज्य के एक करोड़ 35 लाख परिवारों के 4 करोड़ 62 लाख व्यक्तियों का नामांकन हो चुका है एवं उन्हे बहुउद्देश्यीय भामाशाह परिवार पहचान कार्ड आवंटित किए जाने की प्रक्रिया चल रही है।  इस के तहत बैंक खातों में 4700 करोड़ रूपये का लाभ हस्तातंरित हो चुका है।

     जयपुर जिले की ग्राम पंचायत जमवारगढ़ की बीपीएल परिवार की बुजुर्ग श्रीमती केसर देवी मानती है भामाशाह कार्ड ने उन्हें एक नई पहचान दी है। अब भामा शाह कार्ड उनके लिये जादुई चिराग बन गया है क्‍योंकि केवल भामाशाह कार्ड के जरिए ही विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्‍त किया जा सकता है। इसी तरह बीकानेर पंचायत समिति की बंबलू ग्राम पंचायत की बैसाखियों के सहारे चलने वाली नानू देवी  मानती है भामाशाह कार्ड उनकी लाठी है, भले ही वह चलने फिरने से लाचार हैं, लेकिन यह कार्ड उन्हें हर काम में सहारा देता है, चाहे वह पेंशन प्राप्‍त करना हो या कोई और कार्य। कार्ड के कारण उनमें नया आत्म विश्वास से भर गया है।

    आधिकारिक जानकारी के अनुसार यह सुविधा अटल सेवा केन्द्र तथा ई-मित्र केन्द्रों पर स्थाई रूप से उपलब्ध है। जहां किसी परिवार के सभी सदस्य एक साथ जाकर आधार कार्ड व बैंक खाता संख्या के अलावा आवश्यक जानकारी देकर नामांकन करा सकते हैं। यदि किसी परिवार का बैंक खाता नही हो तो उसे भी ई-मित्र केन्द्र पर खुलवाने की सुविधा उपल्ब्ध है। ई-मित्र केन्द्र या भामाशाह योजना की वेबसाइट के माध्यम से ऑनलाइन नामांकन भी कराया जा सकता है। नामांकन और कार्ड से संबंधित समस्याओं व शिकायतों के समाधान के लिए भामाशाह का प्रबंधक जिला कलेक्टर और सांख्यिकी अधिकारियों को इसका अधिकारी और उपखंड अधिकारियों को नोडल अधिकारी बनाया गया है।

    परिवार का कोई भी सदस्य अगर अपना व्यक्तिगत कार्ड बनवाने का इच्छुक हो तो वह 30 रुपये का शुल्क जमा करवाकर यह कार्ड बनवा सकता है। बीपीएल परिवार की महिला मुखिया को सरकार द्वारा भामाशाह कार्ड बनवाने पर दो किश्तों में 2 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि दी जाती है जो महिला मुखिया के खाते में­ जमा करवा दी जाती है। इसकी पहली किश्त के रुप में­ एक हजार रुपये तथा छः महीने बाद दूसरी किश्त के रुप में लाभार्थी के खाते में एक हजार रुपये डालने का प्रावधान किया गया है।

भामाशाह योजना में पें­शन और छात्रावृति जैसे नगद लाभ तथा राशन सामग्री जैसे गैर नगद लाभों के वितरण की शुरूआत हो चुकी है। परिवारों के नामांकन के बाद सत्यापन और भामाशाह परिवार कार्ड बनने की प्रक्रिया के बीच पें­शन, छात्रावृति व राशन कार्ड से जुड़े महत्वपूर्ण विभागों के आंकड़ों के साथ भामाशाह के आंकड़ों का मिलान करते हुए इनमें एकरूपता लाई जा रही है। इससे परिवारों के बारे में दर्ज जानकारी से पें­शन, छात्रावृति व राशन सामग्री के पात्र वर्ग को 'नगद और गैर नगद लाभ’ का पारदर्शी तरीके से वितरण सुनिश्चित होगा। भविष्य में­ इस दूरदर्शी योजना में­ विभिन्न विभागों के अलग-अलग लाभ भी जोड़े जाएंगे। सूत्रो के अनुसार दरअसल इस योजना की परिकल्पना श्रीमती राजे ने अपने पिछले शासनकाल वर्ष 2008 में­ 'आधार कार्यक्रम' से बहुत पहले की थी।

   मुख्यमंत्री श्रीमती राजे ने दिसम्बर, 2013 में पुनः मुख्यमंत्री बनने के बाद भामाशाह योजना का कार्यान्‍वयन फिर से शुरु करने का निर्णय लिया और इसी क्रम में­ भामाशाह योजना का पुनः शुभारंभ गत वर्ष 15 अगस्त को इतिहास पुरूष महाराणा प्रताप को अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले महान दानवीर भामाशाह की पवित्र धरा मेवाड़ के खुबसूरत शहर उदयपुर में­ हुआ। भामाशाह योजना के प्रभावी कार्यान्‍वयन के लिये भारत सरकार द्वारा वर्ष 2015-16 में राष्ट्रीय-ई-गवर्नेंस का "स्वर्ण पुरस्कार" राजस्थान को प्रदान किया गया था।  सूत्रों के अनुसार अब इस योजना के लाभ व्यापक पैमाने पर नजर आने लगा है।

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 *लेखिका स्‍वतंत्र पत्रकार और डॉक्‍युमेंट्री निर्माता है। इस लेख में व्‍यक्‍त किये गये विचार उनके स्‍वयं के हैं।

वीके/एके/वाईबी/37

Tuesday, December 29, 2020

विशेष लेख//महिलाओं के लिए कार्यस्थल पर समानता//*डॉ. साशा रेखी

 14-मार्च-2017 16:10 IST

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस–08 मार्च को याद दिलाते हुए तांकिकोई अभियान छेड़ा जा सके 

महिला समानता की प्रतीकत्मक तस्वीर Pexels-photo by Fauxels

इस वर्ष महिला दिवस का विषय “कार्यस्थल की दुनिया में समानता- वर्ष 2030 तक दुनिया में महिला-पुरुष अनुपात 50-50 करने का लक्ष्य” पर केन्द्रित है।

      यद्यपि कार्यस्थल की दुनिया एवं माहौल महिलाओं के लिए तेज़ी से बदल रहा है, इसके बावजूद, महिलाओं के लिए ‘कार्यस्थल पर समानता’ हासिल करने के लक्ष्य को पाने के लिए अभी हमे लंबी दूरी तय करनी है। हमें महिलाओं के वेतन, अवकाश, विशेषरूप से भुगतान सहित मातृत्व एवं शिशु देखभाल अवकाश, परिवार एवं बुज़ुर्गों की देखभाल के लिए विशेष अवकाश, गर्भावस्था के दौरान संरक्षण, स्तनपान कराने वाली महिलाओं की स्थिति के प्रति संवेदनशीलता और कार्यस्थल पर होने वाले यौन शोषण के क्षेत्र में महिलाओं के लिए पूर्ण समानता की ओर ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है।

हमें अपने घरों की लड़कियों को पारंपरिक शिक्षक, बैंकर आदि नौकरियों के अलावा रोज़गार की व्यापक श्रेणियों (जैसे सेना, खेल आदि) में आगे बढ़ने और रोज़गार हासिल करने के लिए भी प्रेरित करने की ज़रूरत है। हमें अपनी बेटियों को यह सिखाने की आवश्यकता है कि वे बड़े सपने देखें और बड़ा कार्य करने की दिशा में सकारात्मक दृष्टि से कार्य करें।

महिलाओं के करियर में एक अन्य बाधा आत्मविश्वास में कमी और पूर्वाग्रह से ग्रसित होना है, जिसकी वजह से वह ख़ुद अपने आप से ही हार रही हैं। शादी, गर्भावस्था, शिशु जन्म, स्तनपान एवं शिशु देखभाल आदि को महिलाओं के करियर में बाधा या किसी रोक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

अपने जीवन में विभिन्न भूमिकाएं निभाने की वजह से आजकल महिलाएं कार्यस्थल, घर एवं समाज में विभिन्न चुनौतियां का सामना कर रही हैं। हम महिलाओं से अपेक्षा रखते हैं कि वे मेहनत एवं ईमानदारी से नौकरी करने के अलावा गृहिणी, बेटी, बहु, पत्नी एवं समाज में निर्धारित कई अन्य भूमिकाओं को शानदार तरीके से निभाए। परिणामस्वरूप, परिवार एवं आसपास के लोगों की अपेक्षाओं को पूरी न कर पाने की वजह से ज़्यादातर महिलाएं अपराधबोध से ग्रसित हैं। इसकी वजह से महिलाओं में चिंता, अवसाद, खाने का विकार आदि समस्याएं बढ़ रही हैं। कार्यस्थल पर महिलाओं के लिए सुरक्षित एवं बेहतर माहौल के अलावा, महिलाओं के प्रति समाज के दृष्टिकोण एवं व्यवहार में भी व्यापक स्तर पर बदलाव लाने की आवश्यकता है। घर एवं कार्यस्थल, दोनों ही जगहों पर काबिले-तारीफ भूमिका निभाने के लिए, महिलाओं के ऊपर उनकी सीमा से अधिक कार्य करने के लिए दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए।

हमें कार्यस्थल पर महिलाओं की सफलता को सकारात्मक नज़रिए के साथ स्वीकृति देने की आवश्यकता है। यदि कोई महिला सफल होती है तो उसे घर एवं कार्यस्थल दोनों ही जगहों पर विरोध एवं शत्रुता का सामना करना पड़ता है, जबकि वास्तविक तथ्य यह है कि यदि किसी परिवार की महिला भी कार्य करती है तो उस परिवार के जीवन की गुणवत्ता में सकारात्मक रूप से काफी अधिक सुधार हो जाता है। महिलाओं को अपने पेशेवर कार्य के लिए दोषी महसूस नहीं कराया जाना चाहिए, क्योंकि दोनों अभिभावकों का घर से बाहर कार्य करना, बच्चों के लिए खासतौर पर लड़कियों के समग्र विकास के लिए काफी अच्छा होता है। “वह करियर को लेकर अत्यधिक केन्द्रित एवं सकारात्मक है”, इस वाक्य को आज भी समाज में नकारात्मक तारीफ के रूप में देखा जाता है।

हमें युवाओं के बीच ऐसे मूल्यों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है कि वे बढ़े होने के क्रम में ही महिलाओं के साथ कार्य करने और कार्यस्थल पर उनके बेहतर सहयोगी बनने में गर्व महसूस करें। महिलाओं के कार्य करने को नकारात्मक नज़रिए से देखने के बजाय, उनकी प्रतिभा और कार्य की सराहना करें। हमें ऐसे परिवारों की आवश्यकता है, जहां स्वस्थ कार्य वातावरण उपलब्ध कराने के लिए पुरुष भी घरेलू ज़िम्मेदारियों को महिलाओं के साथ मिलकर साझा करें। जिन परिवारों में लिंग के आधार पर भेदभाव कम है (जैसेः मां कार्यस्थल पर नौकरी के लिए जाती हैं और पिता घरेलू ज़िम्मेदारियां संभालते हैं), ऐसे परिवारों के बच्चे अधिक आत्मबल से परिपूर्ण होते हैं। जैसे कि एक बार प्रधानमंत्री ने अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा था कि हमें अपने लड़कों के व्यवहार में व्यापक स्तर पर बदलाव लाने के ज़रूरत है ताकि वे महिलाओं का सम्मान करना सीख सकें। युवा पीढ़ी के पुरुषों को अपने जीवनसाथी के करियर में अहम योगदान देना चाहिए। हमें अपने लड़कों को जीवन में अपने व्यक्तित्व को सौम्य एव सह्रदय बनाने की शिक्षा देनी चाहिए। उन्हें खाना बनाना, कपड़े धोना, बच्चों और बुज़ुर्गों की सेवा करना और उनकी ज़रूरतों को पूरा करना आदि कार्य सिखाने चाहिए ताकि वे भी ज़रूरत पड़ने पर महिलाओं के समान इन पारिवारिक ज़िम्मेदारियों को अपना कर्तव्य समझकर निभा सकें। हमें अपने लड़कों को संतुलित परिवार एवं करियर के मूल्यों को सिखाना चाहिए। हमें उनको यह समझाने की ज़रूरत है कि शरीर की संपूर्ण रचना और शारीरिक दृष्टि से महिलाओं के भी समान सपने और महत्वाकांक्षाएं हैं। लड़कियों को कठोर एवं मज़बूत होने की प्रेरणा देने के अलावा, हमें लड़कों के प्रति अपने रवैये को बदलने की भी आवश्यकता है।

पिछले कुछ समय के दौरान, उच्च श्रेणी की नौकरियों एवं वित्तीय सशक्तता में महिलाओं के प्रतिनिधित्व में व्यापक सुधार दर्ज किया गया है, इसके बावजूद, हमें पेशवर महिलाओं के प्रति अपने अचेतन पूर्वाग्रहों को बदलने की ज़रूरत है। महिलाओं में व्यावहारिक परिवर्तन लाने की भी ज़रूरत है। महिलाओं को ख़ुद के भीतर मौजूद अपार संभावनाओं को लेकर आश्वस्त एवं गौरवान्वित होना चाहिए। महिलाओं के लिए समानता का मतलब केवल समान वेतन नहीं, बल्कि समान अवसर, करियर चुनने की समान स्वतंत्रता और विभिन भूमिकाओं को अदा करना होना चाहिए।

महिला दिवस पर, पूर्वाग्रह एवं असमानताओं को चुनौती और महिलाओं की उपलब्धियों की यात्रा के जश्न द्वारा “बदलाव के लिए सशक्त बनने” की दिशा में महिलाओं को समाधान निकालना चाहिए। आओ, सभी बाधाओं पर काबू पाने के बाद, हम करियर के क्षेत्र में महिलाओं की जीत को सुदृढ़ बनाएं एवं उसका समर्थन करें। महिलाओं के लिए नई रोज़गार के अवसरों का सृजन करें, बदलाव के लिए अत्यंत सशक्त एवं खुले विचारों वाले बनें। (PIB)


Sunday, November 22, 2020

महिलाओं को दोयम दर्जे का बनाए रखने की गंभीर साज़िश

  22nd November 2020 at 3:08 PM

 मंगलसूत्र, पितृसत्तात्मकता और धार्मिक राष्ट्रवाद-राम पुनियानी 

तस्वीर आनंद पवार साहिब के  साभार 

भोपाल
: 22 नवंबर 2020: (राम पुनियानी//वीमैन स्क्रीन)
गोवा के लॉ स्कूल में सहायक प्राध्यापक शिल्पा सिंह के खिलाफ हाल (नवम्बर 2020) में इस आरोप में एक एफआईआर दर्ज की गई कि उन्होंने मंगलसूत्र की तुलना कुत्ते के गले में पहनाए जाने वाले पट्टे से की। शिकायतकर्ता का नाम राजीव झा बताया जाता है।  वो राष्ट्रीय युवा हिन्दू वाहिनी नामक संस्था से जुड़ा है।  एफआईआर में कहा गया है कि शिल्पा सिंह ने जानबूझकर शिकायतकर्ता की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई।  एबीवीपी ने कॉलेज के मैनेजमेंट से भी शिल्पा की शिकायत की है। 

अपने जवाब में शिल्पा ने कहा, “बचपन से मुझे यह जिज्ञासा रही है कि विभिन्न संस्कृतियों में केवल महिलाओं को ही उनकी वैवाहिक स्थिति का विज्ञापन करने वाले चिन्ह क्यों धारण करने होते हैं, पुरुषों को क्यों नहीं।” उन्होंने मंगलसूत्र और बुर्के का उदाहरण देते हुए हिन्दू धर्म और इस्लाम की कट्टरवादी परम्पराओं की आलोचना की। उनके इस वक्तव्य से एबीवीपी आगबबूला हो गयी। 

शिल्पा, दरअसल, उन पितृसत्तात्मक प्रतीकों का विरोध कर रहीं हैं जो हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक परम्पराओं का भाग बन गईं हैं और जिन्हें विभिन्न धार्मिक समुदायों द्वारा अपनी महिलाओं पर थोपा जाता है। ये काम शिल्पा तब कर रहीं हैं जब हमारे देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में धार्मिक राष्ट्रवाद का बोलबाला बढ़ रहा है। भारत में इस तरह के नियमों और परम्पराओं को अचानक अधिक सम्मान मिलने लगा है। रूढ़िवादी नियमों को आक्रामकता के साथ सब पर लादा जा रहा है। उन्हें नया ‘नार्मल’ बनाने की कोशिशें हो रहीं हैं। 

सतही तौर पर देखने से ऐसा लग सकता है कि हिन्दू राष्ट्रवाद का एकमात्र लक्ष्य धार्मिक अल्पसंख्यकों का हाशियाकरण  है।  परन्तु यह हिन्दू धार्मिक राष्ट्रवाद (हिंदुत्व) के एजेंडे का केवल वह हिस्सा है जो दिखलाई देता है।  दरअसल, धर्म का चोला पहने इस राष्ट्रवाद के मुख्यतः तीन लक्ष्य हैं: पहला है धार्मिक अल्पसंख्यकों का हाशियाकरण। यह हमारे देश में देखा जा सकता है। मुसलमानों को समाज के हाशिये पर धकेला जा रहा है और उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने के हर संभव प्रयास हो रहे हैं। दूसरा लक्ष्य है दलितों को उच्च जातियों के अधीन बनाए रखना। इसके लिए सोशल इंजीनियरिंग का सहारा लिया जा रहा है. तीसरा और महत्वपूर्ण लक्ष्य है महिलाओं का दोयम दर्जा बनाए रखना। एजेंडे के इस तीसरे हिस्से पर अधिक चर्चा नहीं होती परन्तु वह भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितने कि अन्य दो हिस्से। 

भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में जहाँ भी राजनीति धर्म के रेपर में लपेट कर पेश की जा रही है वहां वह पितृसत्तात्मकता को मजबूती देने के लिए विविध तरीकों से प्रयास करती है। भारत में महिलाओं के समानता की तरफ कदम बढ़ाने की शुरुआत सावित्रीबाई फुले द्वारा लड़कियों के लिए पाठशाला स्थापित करने और राजा राममोहन राय द्वारा सती प्रथा के उन्मूलन जैसे समाज सुधारों से हुई। आनंदी गोपाल और पंडिता रामाबाई जैसी महिलाओं ने अपने जीवन और कार्यों से सिद्ध किया कि महिलाएं पुरुषों की संपत्ति नहीं हैं और ना ही वे पुरुषों के इशारों पर नाचने वाली कठपुतलियां हैं। ये सभी क्रन्तिकारी कदम पितृसत्ता की इमारत पर कड़े प्रहार थे और इनका विरोध करने वालों ने धर्म का सहारा लिया। 

जैसे-जैसे महिलाएं स्वाधीनता आन्दोलन से जुड़ने लगीं, पितृसत्तात्मकता की बेड़ियाँ ढीली पड़ने लगीं।  पितृसत्तात्मकता और जातिगत पदक्रम के किलों के रक्षकों ने इसका विरोध किया. हमारे समाज में जातिगत और लैंगिक दमन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। 

भारत में मुस्लिम साम्प्रदायिकता भी एक समस्या बन कर उभरी। मुस्लिम लीग के संस्थापक इस समुदाय के श्रेष्ठी वर्ग के पुरुष थे। इसी तरह, हिन्दू महासभा की स्थापना उच्च जातियों के पुरुषों ने की। ये दोनों ही संगठन सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को थामना चाहते थे। 

इस समय भारत में ऊंचनीच को बढ़ावा देने में हिन्दू साम्प्रदायिकता सबसे आगे है। सांप्रदायिक ताकतों का नेतृत्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के हाथ में है, जो केवल पुरुषों का संगठन है। जो महिलाएं ‘हिन्दू राष्ट्र’ के निर्माण में सहयोगी बनना चाहतीं थीं उन्हें राष्ट्रसेविका समिति बनाने की सलाह दी गयी। कृपया ध्यान दें कि महिलाओं के इस संगठन के नाम से ‘स्व’ शब्द गायब है। यह मात्र संयोग नहीं है। यह इस बात का द्योतक है कि पितृसत्तात्मक विचारधाराएं महिलाओं के ‘स्व’ को पुरुषों के अधीन रखना चाहतीं हैं। इन विचारधाराओं के पैरोकारों के अनुसार महिलाओं को बचपन में अपने पिता, युवा अवस्था में अपने पति और बुढ़ापे में अपने पुत्रों के अधीन रहना चाहिए। लड़कियों के लिए दुर्गा वाहिनी नामक संगठन भी बनाया गया है। 

सती प्रथा का उन्मूलन, महिलाओं की समानता की ओर यात्रा का पहला बड़ा पड़ाव था। परन्तु भाजपा सन 1980 के दशक तक इस प्रथा की समर्थक बनी रही।  राजस्थान के रूपकुंवर सती काण्ड के बाद भाजपा की तत्कालीन राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विजयाराजे सिंधिया ने संसद तक मार्च निकल कर यह घोषणा की कि सती प्रथा न केवल भारत की महान परंपरा का हिस्सा है वरन सती होना हिन्दू महिलाओं का अधिकार है। ‘सैवी’ नामक पत्रिका को अप्रैल 1994 को दिए गए अपने साक्षात्कार में भाजपा महिला मोर्चा की मृदुला सिन्हा ने दहेज प्रथा और पत्नियों की पिटाई को उचित ठहराया था। संघ के एक पूर्व प्रचारक प्रमोद मुतालिक ने मंगलौर में पब में मौजूद लड़कियों पर हमले का नेतृत्व किया था। वैलेंटाइन्स डे पर बजरंग दल नियमित रूप से प्रेमी जोड़ों पर हमले करता रहा है। लव जिहाद का हौव्वा भी महिलाओं के जीवन को नियंत्रित करने के लिए खड़ा किया गया है। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने अभिवावकों से कहा है कि वे अपनी लड़कियों पर नज़र रखें और यह देखें कि वे मोबाइल पर किससे बातचीत कर रहीं हैं। 

अमरीका में महिलाओं को जो स्वतंत्रताएं हासिल हैं उन्हें देखकर भारत से वहां गए हिन्दू प्रवासियों को इतना धक्का लगता है कि वे विश्व हिन्दू परिषद और संघ से जुड़ी अन्य संस्थाओं के शरण में चले जाते हैं। वे उन लैंगिक समीकरणों को बनाए रखना चाहते हैं जिन्हें वे भारत से अपने साथ ले जाते हैं। 

ऐसा नहीं है कि केवल संघ ही पितृसत्तात्मकता को औचित्यपूर्ण ठहरता है और "लड़कियों पर नज़र रखने" की बात कहता है. हमारा पूरा समाज इस पश्यगामी सोच के चंगुल में है।  यही कारण है कि शिल्पा सिंह जैसी महिलाएं, जो मंगलसूत्र या बुर्के के बारे में अपने विचार प्रगट करतीं हैं, उन्हें घेर लिया जाता है। संघ के अलावा धर्म के नाम पर राजनीति करने वाली अन्य ताकतें भी लैंगिक मसलों पर ऐसे ही विचार रखतीं हैं। इस मामले में तालिबान व बौद्ध और ईसाई कट्टरपंथी एक ही नाव पर सवार हैं।  हाँ, उनकी कट्टरता के स्तर और अपनी बात को मनवाने के तरीकों में फर्क हो सकता है। 

शिल्पा सिंह इसके पूर्व रोहित वेम्युला, बीफ के नाम पर लिंचिंग और दाभोलकर, पंसारे, कलबुर्गी और गौरी लंकेश जैसे तर्किक्तावादियों की हत्या जैसे मुद्दों पर भी अपनी कक्षा में चर्चा करतीं रहीं हैं। आश्चर्य नहीं कि एबीवीपी उन पर हमलावर है।  (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)   (16 नवंबर, 2020 को  गया)