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Friday, April 21, 2023

तेजी सेठी ने अपनी रचना में उठाया है महत्वपूर्ण मुद्दा

किस असुरक्षा के चलते नारी के मन में होती है पुत्र की चाह?

मुनाफाखोरी की सोच से भरे सिस्टम की या है भूमिका 

नारीवाद के साथ साथ नारी की कलम में ज़ोर भी बढ़ रहा है और बेबाकी भी। सदियों से चले आ रहे शोषण के खिलाफ बुलंद होती आवाज़ अब इस मामले में नारी द्वारा होते शोषण को भी नज़र अंदाज़ नहीं करती। नारी जब खुल कर बेबाकी से लिखती है तो नारी भी उसके निशाने पर रहती है। ऐसी ही एक रचना इन्हीं दिनों सोशल मीडिया पर भी नज़र आई। तेजी सेठी जी द्वारा पोस्ट इस रचना में शोषण की जड़ों तक पहुंचने का प्रयास किया गया है।   

उन्होंने आल इंडिया इंसीचियूट ऑफ़ मेडिकल साइंसिज़ में शिक्षा पाई और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुडी हुई हैं। उनकी लेखनी में विज्ञान का स्वर गहराई से सुनाई देता है। ज़्यादातर साहित्य अंग्रेज़ी में रचा इसलिए उनका अध्यन, सोच और दायरा भी एक तरह से ग्लोबल ही हो गया। 

मात्रभाषा और स्वदेश भाषायो से लगाव उन्हें वापिस इनके पास भी ले आया। हिंदी में भी उन्होंने उच्च कोटि की उत्कृष्ट रचनाएँ लिखी हैं जो सोचने पर मजबूर करती हैं। जिस कविता को यहाँ दिया जा रहा है वह भी सोचने को मजबूर करती है। 


स्त्रियां 

चाहती हैं अपनी कोख से पुत्र

ताकि वक्त आने पर 

दूध का मोल  सकें 

और मां बनने से पहले 

 बन बैठती हैं व्यापारी 

फिर उसी रक्त उपजता है एक पुरुष

जो अपनी स्त्री का लगता है मौल 

अपर यह कोई समझ नहीं पाता 

कि यह सोच उस  तक पहुंची है 

गर्भ नाल से 

और उस पहली स्त्री की अपेक्षाओं का बोझ 

ढोती है दूसरी स्त्री 

यहाँ हर स्त्री 

यहां हर स्त्री किसी दूसरी स्त्री की 

मज़दूरी कर रही है 

और खड़ी कर रही है पितृसत्ता की दीवार 

                        ------------तेजी 

तेजी सेठी की यह काव्य रचना आपको कैसी लगी अवश्य बताएं। साथ ही इस पर भी कुछ कहें तो अच्छा होगा कि औरत को इस तरह सोचने के लिए किसने मजबूर किया। क़ज़ा समाज इस संबंध में अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास करेगा? क़ज़ा व्यापारी करण को बढ़ावा देने वाला पूंजीवाद इस संबंध में कुछ स्वावलोकन करेगा?

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Friday, October 15, 2021

कौन जलाए आज के रावण--कौन जलाए इनकी लंका

3 साल की बच्ची भी नहीं बचती, इन हैवानों से

यह रचना कहां पढ़ी थी.अब यह भी भूल गया। लेखक का पता पश्ते वक्त भी पता नहीं चल सका। इसे इस उम्मीद से सहेज कर रख लिया की शायद जल्द ही लेखक का पता चल सके सम्भव न हो सका। आज दशहरा। सीता माता का हरण करने वाले रावण के अंत की बातें दोहराता दिन। अतीत की बातें करता दिन। अतीत के किस्से दोहराता दिन लेकिन जो आज के रावण हैं उनकी तरफ से आज भी ऑंखें बंद हैं। उनकी चर्चा क्यों नहीं? कौन जलाएगा उन्हें। पढ़िए ज़रा इस रचना को। अंदर तक झंकझोर डालती है। -रेक्टर कथूरिया


बेशर्मी की हद

सब एक सा तो हे,


डिग्रियाँ सलीका नहीं देती,
उम्र लिहाज़ नहीं सिखाती,
DTC की बस नहीं,
तो Metro ही सही,
तम्बाकू खाने वाला ज़ाहिल नहीं,
तो Tie लगाने वाला पढ़ाकू सही,
कमर बस लड़की की चाहिए,
सीने पर हाथ फिराने की मोहलत,
और चलते हुए हाथों को छूने का मौका,
घर पर बहन ठीक है काफी है,
बाहर की हर लड़की एक चीज़ है,
ज़्यादा लिप्सटिक, टाइट कपड़े,
और चाल में उछाल बस काफी है बहाने को,
3 साल की बच्ची भी नहीं बचती, इन हैवानो से,
पहले दूर से देखो, फिर मुस्कुरा दो,
अकेले हो तो हाथ पकड़ लो,
अंधेरा हो तो कमर जकड़ लो,
एक हाथ सीने पर, दूजे से मूह दबा दो,
ज्यादा हाथ - पैर चलाए तो कान पर लगा दो,
यह कहानी सी हो गइ है,
ये बांते रोज़ की, पुरानी सी हो गइ है।
अफसोस है?
शर्म है?
या बेशर्मी की हद?

(लेखक गुमनाम है)


Sunday, February 28, 2021

महिला सम्मान और वास्तविकता

अधिकारों का हनन कब बंद होगा?


लुधियाना
: 28 फरवरी 2021:(वीमेन स्क्रीन डेस्क)::

महिला सम्मान. महिला अधिकार, महिला सशक्तिकरण---ऐसा बहुत कुछ है जो कहा भी जाता है सुना भी जाता है लेकिन वास्तविक स्थिति क्या है इस पर शायद बहुत कम चर्चा होती है। गांवों में सरपंच और शहरों में पार्षद जैसी एक पोस्ट होती है जिस की ज़रूरत शायद हर नागरिक को देर सबेर पड़ती ही है।  आम जनता के काम हो भी जाते हैं लेकिन महिला की जगह उनका पति या कोई और पारिवारिक पुरुष ही मोहर लगाता है। बात भी वही सुनता है। काम करना है या नहीं इसका फैसला भी वही करता है। दबे सुर में इस एतराज़ को उठाया भी जाता है लेकिन बरसों से यही सिलसिला कायम है। या तो महिला के नाम पर पुरुष का दबदबा जारी है या फिर पुरुष को डर है कि उसकी अकेली पत्नी अगर समाज में काम करेगी तो न जाने कैसे परिणाम हों। अभी तक नारी सुरक्षा पूरी तरह सुनिश्चित नहीं की जा सकी। इस दर्दभरी स्थिति की चर्चा न तो महिला कर पाती है और न ही पुरुष। कब बदलेगी समाज की नज़र और सोच। इसी बीच रेनू सिंह ने एक तस्वीर पोस्ट की है जो शायद मई 2020 में पोस्ट की गई थी लेकिन मुझे इन्हीं दिनों नज़र आई है। यह तस्वीर इसी दर्द को ब्यान करती है। बहुत ही सांस्कृतिक शब्दों में और बहुत ही सलीके के साथ यह तस्वीर यह तस्वीर इस अन्याय को बता रही है। इस पर आपके विचारों की इंतज़ार इस बार भी रहेगी ही। 

Friday, September 11, 2020

कोविड-19: महिलाएँ सर्वाधिक प्रभावित,

 चरम ग़रीबी मिटाने में हुई प्रगति पलटने का जोखिम 


बांग्लादेश की राजधानी ढाका में कोविड-19 के कारण बड़ी संख्या में लोगों की आय का स्रोत खो गया है
     ---UN Women/Fahad Kaizer

2 सितम्बर 2020//महिलाएं

वैश्विक महामारी कोविड-19 और उसके सामाजिक-आर्थिक दुष्प्रभाव चार करोड़ 70 लाख महिलाओं को ग़रीबी के गर्त में धकेल सकती है. संयुक्त राष्ट्र ने बुधवार को एक नई रिपोर्ट जारी की है जो दर्शाती है कि कोरोनावायरस संकट के कारण चरम ग़रीबी से निपटने में अब तक हुई दशकों की प्रगति की दिशा उलटने का ख़तरा पैदा हो गया है। यूएन के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा है कि कोविड-19 से उबरने के दौरान पुनर्बहाली कार्रवाई और नीतिगत प्रयासों के केन्द्र में महिलाओं को रखना होगा। 

महिला सशक्तिकरण के लिये संयुक्त राष्ट्र संस्था (UN Women) और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा कराए गए इस अध्ययन में महिलाओं के लिये ग़रीबी दर में 9.1 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। 

कोविड-19 से पहले वर्ष 2019 से 2021 के बीच इस दर के 2.7 फ़ीसदी घटने का अनुमान था। 

अनुमान दर्शाते हैं कि विश्वव्यापी महामारी से दुनिया भर में ग़रीबी पर असर पड़ा है लेकिन इसका महिलाओं, विशेषत: प्रजनन उम्र की महिलाओं पर ज़्यादा असर हुआ है। 

वर्ष 2021 तक, 25 से 34 वर्ष आयु वर्ग में चरम ग़रीबी का सामना करने वाले हर 100 पुरुषों की तुलना में 118 महिलाएँ चरम ग़रीबी का शिकार होंगी. प्रतिदिन 1 डॉलर 90 सेंट (लगभग 140 रुपये) या उससे कम रक़म पर गुज़ारा करने वाले लोग चरम ग़रीबी की श्रेणी में आते हैं। 

वर्ष 2030 तक यह अन्तर 100 पुरुषों की तुलना में 121 महिलाओं तक बढ़ने की आशंका है। 

'From Insights to Action: Gender Equality in the Wake of COVID-19' शीर्षक वाली इस रिपोर्ट के आँकड़े दर्शाते हैं कि कोविड-19 के कारण साढ़े नौ करोड़ से ज़्यादा लोग वर्ष 2021 तक चरम ग़रीबी के गर्त में धँस जाएँगे. इनमे क़रीब साढ़े चार करोड़ महिलाएँ व लड़कियाँ हैं। 

इन हालात में चरम ग़रीबी का शिकार हुए कुल लोगों की संख्या बढ़कर 43 करोड़ 50 लाख हो जाएगी और इस आँकड़े को महामारी से पहले के स्तर पर वर्ष 2030 से पहले नहीं लाया जा सकेगा।   

पुनर्बहाली के केन्द्र में महिलाएँ

संयुक्त राष्ट्र महिला संस्था की कार्यकारी निदेशक पुमज़िले म्लाम्बो-न्गुका ने बताया कि चरम ग़रीबी का दंश झेलने वाली महिलाओं की संख्या में बढ़ोत्तरी, समाज और अर्थव्यवस्था की विसंगतियाँ व ख़ामियाँ उजागर करती है। 

“हम जानते हैं कि परिवार की देखरेख करने की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी महिलाएँ निभाती हैं. वे कम आमदनी अर्जित करती हैं, कम बचत कर पाती हैं और उनके रोज़गार भी कम निश्चित होते हैं।” 

उन्होंने बताया कि कुल मिलाकर पुरुषों की तुलना में महिलाओं के रोज़गारों पर 20 फ़ीसदी ज़्यादा जोखिम है। 

यूएन की वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक इतनी सारी विषमताओं के तथ्यों के बाद महामारी से उबरते समय नीतिगत कार्रवाई को तेज़ गति से आगे बढ़ाया जाना होगा और उसके केन्द्र में महिलाओं को रखना होगा।  

लैंगिक विषमताओं से निपटना 

टिकाऊ विकास के 2030 एजेण्डा में वर्ष 2030 तक चरम ग़रीबी के उन्मूलन का लक्ष्य रखा गया है लेकिन कोरोनावायरस संकट की वजह से ना इस पर सिर्फ़ गम्भीर ख़तरा पैदा हो गया है बल्कि हालात और भी ख़राब होने की आशंका जताई जा रही है। 

महिलाओं व लड़कियों के लिये ग़रीबी दर बढ़ने का अर्थ सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में गिरावट दर्ज होना भी है।  

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के प्रशासक एख़िम श्टाइनर ने बताया कि 10 करोड़ महिलाओं व लड़कियों को ग़रीबी से निकाला जा सकता है बशर्ते के सरकारें शिक्षा के अवसरों, परिवार नियोजन, न्यायसंगत और समान वेतन व सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाने पर ध्यान दे। 

“महिलाएँ कोविड-19 संकट के प्रकोप का सामना कर रही हैं क्योंकि उनके लिये अपनी आय का स्रोत खोने और सामाजिक संरक्षा उपायों से बाहर रहने की आशंका ज़्यादा है।”

ये भी पढ़ें - कोविड-19: महिलाओं व लड़कियों के लिये पीढ़ियों की प्रगति खो जाने का ख़तरा

“लैंगिक विषमताओं को घटाने में निवेश करना ना केवल स्मार्ट और किफ़ायती उपाय है बल्कि यह एक ऐसा ज़रूरी चयन है जिससे सरकारें ग़रीबी घटाने के प्रयासों पर महामारी के असर को उलट सकती हैं।”

वैसे तो अध्ययन के निष्कर्ष चिन्ताजनक है लेकिन अनुमान लगाया गया है कि वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के महज़ 0.14 फ़ीसदी (2 ट्रिलियन डॉलर) की मदद से दुनिया को चरम ग़रीबी के चंगुल से निजात दिलाई जा सकती है।  

48 अरब डॉलर की धनराशि की ज़रूरत लैंगिक स्तर पर ग़रीबी की खाई को पाटने में होगी। 

लेकिन अगर सरकारें असरदार कार्रवाई करने में विफल रहती हैं या देर करती हैं तो प्रभावितों की वास्तविक संख्या इससे कहीं ज़्यादा होने की आशंका है।