src='https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js'/> वीमेन स्क्रीन

Saturday, August 1, 2020

महिला उद्यमियों की छलांग

 जीडीपी की नॉन लीनियर वृद्धि और समाज की उन्नति 
31 July 2018 
पॉला मारीवाला, को-प्रेज़िडेंट स्टैनफर्ड एंगल्स एंड इंटरप्रेन्योर्स इंडिया, निदेशक, हिंदीट्रोन ग्रुप, और इसी आलेख पर मेहनत करने वाली दूसरी लेखिका हैं राधिक शाह। उनका भी बहत नाम है। वह हैं एडवाइजर, सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स फिलेंथ्रॉपी प्लेटफॉर्म, को-प्रेज़िडेंट, स्टैनफर्ड एंगल्स एंड इंटरप्रेन्योर्स

विश्व में महिला उद्यमियों की संख्या बढ़ रही है और परिवर्तन का दौर जारी है- व्यापार की यह शैली असामान्य भले हो लेकिन अब जल्द ही एक कायदा बनने जा रही है।
हम मानते हैं कि विशेष रूप से इस डिजिटल दौर में महिलाओं को मजबूत करने तथा उनके लिए रोजगार एवं उद्यमिता का माहौल तैयार करने से लिंग भेद दूर होगा। साथ ही जीडीपी की नॉन लीनियर वृद्धि होगी और सार्वजनिक संपत्ति का निर्माण भी होगा। इसका समाज पर सकारात्मक प्रभाव होगा। दरअसल ऐसा व्यावसायिक मॉडल तैयार किया जाना चाहिए जो लैंगिक समानता को मजबूत करे और महिला नेतृत्व को मंच प्रदान करे।
भले ही यह एक व्यापक अनुमान और पूर्वाग्रह भरा बयान लगे, लेकिन हम इस बात से सहमत हैं कि शीर्ष पदों पर बैठी महिलाएं अक्सर ऐसे गुणों का प्रदर्शन करती हैं जिनसे आज की जटिल दुनिया में सफलता हासिल की जा सकती है, जैसे सहानुभूति और सहयोगपरक नेतृत्व, साथ ही लचीलापन और परस्पर लाभ का दृष्टिकोण। महिलाएं अपने समुदाय से जुड़ी होती हैं और समुदाय तथा विश्व पर अपने संगठन के नकारात्मक और सकारात्मक असर के बारे में अधिक जागरूक होती हैं। यह ऐसा गुण है जो आज के दौर में अधिक प्रासंगिक है। इसके विपरीत प्रबंधन की परंपरागत शैली में एक अकेला अल्फा लीडर टॉप डाउन स्टाइल में एक संगठन को चलाया करता है। वह अकेले फैसले लेता है और उसके सहयोगी कर्मचारियों को सिर्फ उन फैसलों का पालन करना होता है।
यहां कुछ विशेषताओं का उल्लेख किया जा रहा है जिनके जरिए शीर्ष पदों पर बैठी महिलाएं समाज को प्रभावित करने वाले लाभकारी संगठनों की स्थापना कर सकती हैं। साथ ही एक सहयोगपरक अर्थव्यवस्था का भी निर्माण कर सकती हैं।
सहयोगपरक नेतृत्व वाली टीम: 
शीर्ष पदों पर बैठी महिलाएं अक्सर अपने सहकर्मियों के साथ मिलकर काम करती हैं जिससे विभिन्न प्रकार के विचारों का आदान-प्रदान होता है और बेहतर परिणाम निकलते हैं।
एक दूसरे के प्रतिसंवेदना हो तो लोग परस्पर जुड़ते हैं और काम करने के लिए प्रेरित होते हैं: दूसरे के नजरिए से सोचने से किसी व्यक्ति के विचारों को गहराई से समझने में मदद मिलती है और शीर्ष पदों पर बैठी महिलाएं, कंपनी के भीतर कर्मचारियों में और कंपनी के बाहर पार्टनर्स में काम के प्रति उत्साह पैदा कर सकती हैं।
उत्तरदायित्वपूर्ण व्यापारिक मॉडल्स: 
ऐसी अनेक महिलाएं हैं जो देश-दुनिया के बारे में सोचती हैं। इसीलिए अक्सर वे ऐसे व्यापारिक मॉडल/दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं जिनका विश्व स्तर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और सार्वजनिक संपत्ति का निर्माण होता है- कई बार ये डबल या ट्रिपल बॉटम लाइन मॉडल्स होते हैं। वे उस माहौल में भी सकारात्मक पहल करती हैं, जहां कोई दूसरे के बारे में नहीं सोचता।
साझेदारीसे परस्पर लाभ की सोच पैदा होती है: सहयोग की इच्छा के कारण ऐसे संयुक्त उपक्रम स्थापित होते हैं जो एक दूसरे को लाभ पहुंचाते हैं। विश्व की कुछ चुनौतियों से निपटना आसान होता है, जीडीपी की नॉन लीनियर वृद्धि होती है और उन नए क्षेत्रों से मुनाफा कमाया जाता है जिनका अब तक अस्तित्व ही नहीं होता।
हम यहां परिवर्तन की अगुवा कुछ भारतीय महिलाओं के उदाहरण पेश कर रहे हैं। उन्होंने अपने रचनात्मक डिजिटल मॉडल्स से उद्योग जगत की तस्वीर ही बदल दी। उनकी कंपनियों ने भरपूर मुनाफा कमाया, कई ने अपने देश में, तो कई ने पूरी दुनिया में परिवर्तन की लहर पैदा कर दी।
1.सामासोर्स की सीईओ लीला जानाह का असर पूरी दुनिया में नजर आता है। सामासोर्स ने डिजिटल माइक्रोवर्क को सिलिकॉन वैली से दक्षिण एशिया, अफ्रीका तक पहुंचाया है और ग्रामीण महिलाओं को गरिमा प्रदान करते हुए उन्हें सशक्त किया है। उनकी कंपनी विभिन्न देशों में स्थानीय संगठनों के साथ काम करती है और महिलाओं को नए किस्म का काम सिखाती है। सामासोर्स ने ग्रामीण महिलाओं की सामाजिक स्थिति को मजबूत किया है। कभी परिवार के सदस्यों पर आर्थिक रूप से निर्भर रहने वाली महिलाएं अब परिवार की सबसे ज्यादा कमाऊ सदस्य बन गई हैं।
2.योरदोस्त की सीईओ ऋचा सिंह ने मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक नई पहल की। उन्होंने भारत में मनोचिकित्सकों को उन लोगों से ऑनलाइन जोड़ा जिन्हें भावनात्मक मदद और चिकित्सा की जरूरत है। उन्होंने सुनिश्चित किया कि उन लोगों की पहचान सुरक्षित रहे- इंटरनेट के जरिए लोगों को गुमनाम रखना सरल है और ऋचा ने इसका लाभ उठाया। स्वास्थ्यकर्मियों और मरीजों के बीच एक संबंध कायम हुआ- व्यापार का एक नया मॉडल उभरकर सामने आया और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े पूर्वाग्रह तोड़ने में मदद मिली।
3.जुम की रितु नारायण सुरक्षित और भरोसेमंद यात्रा मुहैय्या कराती हैं जिनके कारण समाज के संवेदनशील वर्गों जैसे बच्चों और बुजुर्गों को विश्वासपात्र, जानकार और जांचे-परखे ड्राइवर्स के साथ सफर करने का मौका मिलता है। ड्राइवर्स यात्रियों की पूरी देखभाल करते हैं और उन्हें सुरक्षित पिक अप/ड्रॉप सर्विस उपलब्ध कराते हैं।
4.फ्रंटियर मार्केट्स की अजेता शाह ग्रामीण परिवारों को स्वच्छ ऊर्जा उत्पाद उपलब्ध कराती हैं। इसके लिए उन्होंने ग्रामीण महिलाओं का एक वितरण नेटवर्क सोलर सहेली तैयार किया है जोकि रोजगार सृजन भी करता है। उनकी कंपनी ने 3000 ग्रामीण उद्यमी तैयार किए हैं जिनमें से एक तिहाई महिलाएं हैं। ये सभी मिलकर 380,000 परिवारों को सौर ऊर्जा उपलब्ध कराते हैं और बिजली की समस्या भी दूर होती है।
इन प्रेरणाप्रद महिलाओं ने उत्तरदायित्वपूर्ण और समावेशी नेतृत्व की मिसाल पेश की है। उनके नेतृत्व से समाज पर सकारात्मक असर हुआ। उनके व्यापारिक मॉडल ने मुनाफा कमाने के साथ-साथ समाज की मदद भी की है। इन मॉडल्स ने तकनीक का उपयोग करके नया दृष्टिकोण विकसित किया है और बड़े पैमाने पर लोगों का जीवन बदला है। विश्व में महिला उद्यमियों की संख्या बढ़ रही है और परिवर्तन का दौर जारी है- व्यापार की यह शैली भले ही असामान्य हो लेकिन अब जल्द ही एक कायदा बनने जा रही है।
हम महात्मा गांधी के कथन से इस लेख को समाप्त करते हैं जो आज के डिजिटल युग में भी प्रासंगिक है। वह कहा करते थे-“स्त्रियों को कमजोर बताना उनका अपमान करना है, यह पुरुषों द्वारा महिलाओं के प्रति अन्याय है। अगर शक्ति का अर्थ क्रूरता है तो निस्संदेह स्त्रियां पुरुषों से कम क्रूर हैं। पर अगर ताकत का अर्थ नैतिक शक्ति है तो स्त्रियां पुरुषों से कहीं अधिक श्रेष्ठ हैं। क्या उनमें अधिक अंतर्ज्ञान नहीं होता, क्या वे अधिक आत्म-त्याग नहीं करतीं, क्या उनमें अधिक धीरज नहीं होता, क्या उनमें अधिक साहस नहीं होता? उनके बिना पुरुषों का क्या अस्तित्व है। अगर अहिंसा हमारे अस्तित्व का कारण है, तो भविष्यकाल स्त्रियों के नाम है।”

लेखकों के विषय में
पॉला मारीवाला ने सफलता के लिए किये जाते संघर्ष कोइतना नज़दीक से देखा कि वह संघर्ष का रूप ही हो गई। वह स्टैनफर्ड एंजल्स एंड इंटरप्रेन्योर्स इंडिया की संस्थापक और को-प्रेज़िडेंट हैं। यह स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी के एल्यूमनीज़ का समूह है जोकि एंजल इनवेस्टर्स के तौर पर स्टार्टअप कंपनियों में शुरुआती चरण में निवेश करता है। पॉला भारत के प्रमुख अर्ली स्टेज वेंचर कैपिटल फंड सीडफंड की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर भी हैं। वह देश की सबसे पुरानी आईटी कंपनी हिंदीट्रोन की डायरेक्टर हैं। भारत में हिंदीट्रोन का 25 से अधिक कंपनियों के साथ संयुक्त उपक्रम है जोकि उन्हें देश में हाई टेक उपकरणों की बिक्री का मुख्य खिलाड़ी बनाती है। यूएसए और भारत, दोनों देशों की टेक कंपनियों को पॉला के 20 साल के उद्यमिता और ऑपरेशनल अनुभवों का लाभ हासिल हुआ है।
राधिका शाह इसी क्षेत्र की एक अनुभवी  लेखिका है। उसने वही लिखा जो उसने जिंदगी में बेहद करीब हो कर देखा। जिंदगी को बहुत ही नज़दीक हो कर देखे बिना इसके रहस्य और सत्य समझ भी नहीं आते। सिलिकॉन वैली की एंजल और इंपैक्ट इनवेस्टर तथा स्टैनफर्ड एंजल्स एंड इंटरप्रेन्योर्स की को-प्रेज़िडेंट हैं। इन पदों पर भी उसने गहरा अनुभव अर्जित किया। यह स्टैनफर्ड के 1200 से अधिक पूर्व विद्यार्थियों, फैकेल्टी और एल्यूमनी का समूह है। वह सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स फिलेंथ्रॉपी प्लेटफॉर्म की एडवाइज़र और पूर्व अशोका सीवी चैप्टर की सह संस्थापक हैं। भारत में एसवी लीडरशिप काउंसिल की सदस्य हैं और इंपैक्ट एक्सपीरियंसेज एंड एल्यूमन कैपिटल की एडवाइजर हैं जो इंपैक्ट फंड्स का एक कोष है। सबसे बड़ी बात इस समय वह  आइकॉन की तरह इ। वह इ महिलायों के लिए एक उदाहरण भी है। 

Tuesday, July 28, 2020

लोगों में उम्मीद की किरण जगाती अंजली

 अस्पताल वॉर्ड के बाहर भी है ज़िंदगी 
27th July 2018 
*परोमिता चौधरी, प्रोग्राम ऑफिसर, ओक फाउंडेशन और
*रेशल मेककी, कम्यूनिकेशन ऑफिसर, ओक फाउंडेशन
भारत के अनेक भागों में मानसिक बीमारियों से लोग डरते हैं- परिवार के सदस्य सोचते हैं कि मरीजों की देखभाल करने से उन पर वित्तीय बोझ पड़ेगा, चूंकि ऐसा माना जाता है कि मानसिक रोगी कभी कोई रोजगार नहीं कर सकते। 
शंपा पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के पावलोव मेंटल हेल्थ हॉस्पिटल के कैफेटेरिया में काम करती है। चा-घर (बांग्ला में) नाम के इस कैफेटेरिया में घुसते ही आपका स्वागत इतनी गर्मजोशी से किया जाएगा कि आपका ह्दय गदगद हो जाएगा। शंपा सहित यहां काम करने वाली छह महिलाएं उजली मुस्कान से आपका स्वागत करेंगी और भरपूर नाश्ता और गर्मागर्म चाय या कॉफी पिलाएंगी। हालांकि कुछ समय पहले तक ये महिलाएं परेशान हाल इसी अस्पताल में मरीजों के तौर पर भर्ती थीं।
भारत के ज्यादातर हिस्सों में मानसिक बीमारियां एक श्राप की तरह हैं। लोग घबराते हैं कि मानसिक रूप से बीमार लोगों की देखभाल कैसे की जाएगी। इन लोगों को बोझ समझा जाता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि मानसिक रूप से बीमार लोग कोई रोजगार नहीं कर सकते। यह भय मानसिक बीमारियों को एक कलंक बनाता है। रोगी के स्वस्थ होने के बावजूद परिवार के लोग उससे कोई नाता नहीं रखना चाहते। अंजली नामक संस्था मानसिक रोगियों के लिए काम करने वाले संगठनों में से एक है। यह उनके बीच काम करती है और मनोसामाजिक विकारों से ग्रस्त लोगों के अधिकारों के लिए जन समर्थन जुटाती है। कोलकाता के मेंटल हेल्थ हॉस्पिटल्स के साथ काम करने के दौरान अंजली ने यह महसूस किया कि मरीज किस तरह अपने समुदायों से कट जाते हैं। उन्हें मुख्यधारा में लाने का प्रयास नहीं किया जाता।
अंजली के कर्मचारियों ने पश्चिम बंगाल के दो अस्पतालों- कोलकाता के पावलोव मेंटल हेल्थ हॉस्पिटल और मुर्शीदाबाद के बेहरामपुर हॉस्पिटल से बातचीत की। इसके बाद संस्था ने मरीजों के इलाज के तरीकों में विविधता लाने के लिए अस्पताल के साथ काम करना शुरू किया। इस तरह के इलाज में दवाएं देना शामिल नहीं था। आम तौर पर मरीज नए काम सीखना चाहते हैं क्योंकि उन्हें उम्मीद होती है कि इसके जरिए वे आत्मनिर्भर बन सकते हैं, साथ ही परिवार की आय में योगदान दे सकते हैं। अंजली ने मरीजों को विभिन्न कलाएं, जैसे संगीत, चित्रकला और थियेटर सीखने का मौका दिया।
तीन वर्षों में अंजली ने दो अस्पतालों के साथ मिलकर कई माइक्रो इंटरप्राइज़ शुरू किए। पावलोव हॉस्पिटल में मिनी लॉन्ड्रेट (लॉन्ड्री), टाई एंड डाई यूनिट और कैफेटेरिया शुरू किया गया। बेहरामपुर हॉस्पिटल (मुर्शीदाबाद का जिला मुख्यालय) में डेलिकेट इंब्रॉयडरी यूनिट खोली गई। इन सभी इंटरप्राइज़ेज़ में ज्यादातर वही लोग काम कर रहे हैं, जो कभी अस्पताल में अपना इलाज करा रहे थे। हालांकि कैफेटेरिया में काम करने वाली कुछ महिलाएं अपने घर लौट चुकी हैं और कैफेटेरिया में काम करने के लिए रोजाना अपने घर से आती हैं (कई बार दो घंटे का सफर तय करके)।
इन माइक्रो इंटरप्राइज़ेज़ में काम करने वाले 50 से अधिक स्वयंसेवियों ने उम्मीद और जिजीविषा की कहानियां बुनी हैं। लोगों की अवहेलना, हिंसा, लांछन और अपमान सहने के बावजूद उनमें हिम्मत कायम है और इसी की वजह से वे दोबारा अपनी जिंदगी संवारने की कोशिश कर रहे हैं। शंपा को ही लीजिए। अपनी बेटी की कस्टडी पाने के लिए उसने लंबी अदालती लड़ाई लड़ी है। उसके पति ने यह कहकर शंपा को उसकी बेटी से अलग कर दिया था कि शंपा की ‘मानसिक स्थिति ठीक नहीं’ है।
इन माइक्रो इंटरप्राइज़ेज़ ने रूढ़ियां भी तोड़ी हैं। इनसे यह साबित हुआ है कि मानसिक बीमारियों के शिकार लोगों को निरर्थक और निकम्मा नहीं माना जाना चाहिए। यह भी कि मनोसामाजिक विकार से ग्रस्त महिलाएं भी काम कर सकती हैं, रोजगार कर सकती हैं।
समाज के कुछ तबकों में मनोसामाजिक विकार के शिकार लोगों को गंदा समझा जाता है। इसलिए यह देखने के बाद कि ये लोग कड़ी मेहनत करके अस्पताल के बिस्तर, पर्दों, कपड़ों वगैरह को साफ-सुथरा, क्रिस्प रखने की कोशिश कर रहे हैं, यह भ्रामक धारणा टूटती है। इसी सोच के कारण स्वस्थ होने के बावजूद लोगों को सम्मानजनक, उत्पादक जीवन से महरूम होना पड़ता है। माइक्रो इंटरप्राइज़ेज़ ने इस सोच को बदला है। यहां काम करने वाले लोग एक महीने में लगभग 15-16 दिन काम करते हैं और 8 घंटे काम करके करीब 5 US$ कमा लेते हैं।
चा-घर यह भी बताता है कि भूख की भाषा एक ही होती हैं और पकाने वाले की मेहनत ही `भोजन को स्वादिष्ट और पौष्टिक बनाती है। आप उन लोगों के हाथों से पका और परोसा खाना भी खा सकते हैं जो कभी मानसिक बीमारियों का शिकार थे। यह भी कि हम सभी के अधिकार एक बराबर हैं- हम सभी को सम्मानजनक जीवन जीने का हक है। इस कैफेटेरिया में रोजाना करीब 200 ग्राहक आते हैं। इनमें अस्पताल के कर्मचारी, मरीज या मरीज के परिवार के सदस्य, सभी शामिल होते हैं। ग्राहक खुश होते हैं कि उन्हें अस्पताल के अंदर ही किफायती और पौष्टिक खाना मिल जाता है- शंपा और उसकी साथिनें खुश होती हैं क्योंकि अब उन्हें छोटे-मोटे खर्चे या अपने बच्चों को स्कूल भेजने लिए दूसरों के सामने हाथ नहीं फैलाने पड़ते। चूंकि हर महीने कैफेटेरिया की कमाई 50 US$ के करीब है।
अंजली ने माइक्रो इंटरप्राइज़ शुरू करने का सुझाव दिया। अस्पताल प्रशासन ने इस सुझाव को माना और इस सपने को हकीकत में बदला। अब अस्पताल के मरीजों के लिए नई राह खुली है। इस पहल की कामयाबी से दूसरे भी प्रेरणा ले रहे हैं। कई अन्य जगहों पर ऐसी पहल की जा रही है। अंजली और दूसरी सरकारी संस्थाएं इसमें अपना सहयोग देने के लिए तैयार हैं। शंपा और उसकी साथिनें दूसरे मरीजों को प्रेरणा दे रही हैं जिन्होंने यह मान लिया था कि अस्पताल का वॉर्ड ही अब उनकी दुनिया है। इस बीच अंजली, अस्पताल और उसके स्वयंसेवी इस मुहिम को आगे बढ़ा रहे हैं। मिलजुलकर मरीजों के लिए ऐसी दुनिया रच रहे हैं जहां वे आजाद होकर सफल जिंदगी जी सकें। (UN India)
**निजता के लिए कुछ लोगों के नाम बदल दिए गए हैं और उनकी पहचान से जुड़े विवरण में परिवर्तन कर दिया गया है।

लेखक के बारे में
*पारोमिता चौधरी
पारोमिता चौधरी ने 2012 में प्रोग्राम ऑफिसर के तौर पर ओक फाउंडेशन में काम करना शुरू किया। वह ज्वाइंट इंडिया प्रोग्राम में ग्रांट्स का प्रबंधन करती हैं। ओक फाउंडेशन से पहले वह केयर इंडिया और ऑक्सफैम ग्रेट ब्रिटेन में प्रजनन अधिकारों, आर्थिक न्याय, अनिवार्य सेवा अधिकारों और लैंगिक न्याय जैसे क्षेत्रों में काम कर चुकी हैं। वह पिछले 20 सालों से सामाजिक विकास के क्षेत्र से जुड़ी हैं और उन्हें भारत के सुदूर जिलों में उल्लेखनीय कार्य करने का अनुभव है। इस विशेष रचना में भी पारोमिता चौधरी ने बहुत ही संवेदनापूर्ण और दिलचस्प ढंग से अंजलि की कहानी सुनाई है जो पढ़ने सुनने वालों को प्रेरणा देती है। 
*रेशल
रेशल ने 2012 में राइटर/एडिटर के तौर पर ओक फाउंडेशन में काम करना शुरू किया था। 2017 में वह कम्यूनिकेशन ऑफिसर बनीं। स्टाफ, ट्रस्टी और पार्टनर्स के साथ उन्होंने संस्था की रिपोर्ट्स को संपादित किया और वार्षिक रिपोर्ट्स तथा दूसरे प्रकाशनों जैसे वेबसाइट्स और न्यूजलेटर्स के लेखों को लिखने और संपादित करने का काम किया। रेशल संस्था के बाहरी और भीतरी कम्यूनिकेशन के लिए वीडियो बनाती हैं। इसके अलावा ओक ग्रांटीज के साथ सोर्स स्टोरीज, फोटो और संस्था के कामों की दूसरी जानकारियां साझा करती हैं।
रेशल को स्विट्जलैंड में मानवतावादी और मानवाधिकार संगठनों के लिए कम्यूनिकेशन का काम करने का आठ साल का अनुभव है। उन्होंने वार्षिक रिपोर्ट्स और दूसरे प्रकाशनों में लिखने, संपादन करने और प्रिंट प्रोडक्शन प्रक्रियाओं का प्रबंधन करने में अपना अत्यधिक समय बिताया है। इससे पहले वह डबलिन और लंदन में एक आयरिश नेशनल ब्रॉडकास्टर के सेल्स और मार्केटिंग डिविजन में सात सालों तक काम कर चुकी हैं। वहां रेशल एयरटाइम नेगोसिएशन, सेल्स और मीडिया प्लानिंग में शामिल थीं।

Wednesday, October 16, 2019

ग्रामीण महिलाएं अनेक समुदायों की रीढ़ होती हैं

10 अक्तूबर 2019//यूएनआईसी/प्रेस विज्ञप्ति/213-2019//Posted on 15th October 2019  By UN India Hind
 जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभाव उनकी मुश्किलें बढ़ा देते हैं  
ग्रामीण महिलाएं अनेक समुदायों की रीढ़ होती हैं। किंतु वे हमेशा ऐसी बाधाओं का सामना करती है जो उन्हें अपनी क्षमता का पूरा उपयोग नहीं करने देती। जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभाव उनकी मुश्किल है बढ़ा रहे हैं।
दुनिया भर में लगभग एक-तिहाई महिलाएं खेती में काम करती हैं। महिलाएं जमीन से फसल उगाती हैं, आहार, पानी और आवश्यक ईंधन जुटाती हैं और पूरे परिवार को सहारा देती हैं फिर भी उन्हें जमीन, वित्तीय सुविधाओं, उपकरणों, बाजारों और निर्णय लेने की शक्ति में बराबर भागीदारी नहीं मिलती।
जलवायु परिवर्तन इस असमानता को बढ़ा रहा है जिससे ग्रामीण महिलाएं और लड़कियां और पीछे छूटती जा रही हैं। 2006 से 2016 के बीच जलवायु से जुड़ी आपदाओं से कुल क्षति और नुकसान की एक-चौथाई मार विकासशील देशों में कृषि क्षेत्र पर पड़ी है और ऐसी आपदाओं से महिलाओं ने बेहिसाब कष्ट भोगा है।
इसके साथ ही यह भी सच है ग्रामीण महिलाओं के पास ज्ञान और कौशल का ऐसा भंडार है जो समुदायों और समाजों को प्रकृति पर आधारित, कम कार्बन उत्सर्जक समाधानों के जरिए जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुरूप ढलने में मदद कर सकते हैं। किसान और उत्पादक के रूप में, महिलाएं, जलवायु में परिवर्तन और सूखे, गर्मी की मार तथा अत्यधिक वर्षा जैसे झटकों का सामना करने के लिए पारंपरिक और आधुनिक दोनों तरह के तरीके अपनाने में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं।
ग्रामीण महिलाओं की बात सुनने और उनकी आवाजों को अधिक शक्ति देने के प्रयास जलवायु परिवर्तन के बारे में ज्ञान का प्रसार करने और सरकारों, कारोबारी तथा समुदाय के नेताओं से कार्रवाई का आग्रह करने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। खेती की नई तकनीक को सबसे पहले अपनाने वालों संकट में सबसे पहले कार्रवाई करने वालों और पर्यावरण अनुकूल ऊर्जा उद्यमियों के रूप में ग्रामीण महिलाएं ऐसी शक्तिशाली संसाधन है जो वैश्विक प्रगति को संचालित कर सकती हैं।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर आइए दुनिया भर में ग्रामीण महिलाओं और लड़कियों को सहारा देकर ऐसे भविष्य की दिशा में ठोस कदम उठाएं।

Friday, July 12, 2019

विश्व की जनसंख्या लगातार बढ़ रही है

11 जुलाई 2019
 जनसंख्या में वृद्धों की संख्या भी तेज़ी से बढ़ रही 
टिकाऊ विकास के लिए 2030 की कार्यसूची स्वस्थ ग्रह पर सभी के लिए बेहतर भविष्य हेतु विश्व का ब्ल्यूप्रिंट है। विश्व जनसंख्या दिवस पर हम इस बात को मान्यता देते हैं कि यह अभियान जनसंख्या वृद्धि, वृद्ध होती जनसंख्या, प्रवास और शहरीकरण सहित जनसांख्यिकीय रुझानों से बहुत हद तक जुड़ा हुआ है।
विश्व की जनसंख्या लगातार बढ़ रही है लेकिन यह वृद्धि बहुत असमान है। विश्व के सबसे कम विकसित देशों के लिए टिकाऊ विकास की दिशा में सबसे बड़ी चुनौती तेजी से बढ़ती जनसंख्या और जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता है। दूसरे देशों में अन्य प्रकार की समस्याए हैं। वहां जनसंख्या में वृद्धों की संख्या बढ़ रही है। इसके अलावा उन देशों को वृद्ध होते लोगों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता पैदा करने और पर्याप्त सामाजिक संरक्षण प्रदान करने की चुनौती का भी सामना करना पड़ रहा है। जैसे कि विश्व में शहरीकरण बढ़ रहा है, 2050 तक विश्व की 68% जनसंख्या के शहरों में बसने का अनुमान है। ऐसी स्थिति में टिकाऊ विकास और जलवायु परिवर्तन बहुत हद तक शहरी विकास के सफल प्रबंधन पर निर्भर करेगा।
जनसंख्या के रुझानों को संभालने के साथ-साथ हमें जनसंख्या, विकास और व्यक्तिगत कल्याण के बीच के संबंधों को भी स्वीकार करना होगा। पच्चीस वर्ष पूर्व जनसंख्या और विकास पर काहिरा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में विश्व नेताओं ने सबसे पहले जनसंख्या, विकास और प्रजनन अधिकारों सहित मानवाधिकारों के बीच के संबंधों को रेखांकित किया। उन्होंने इस बात को भी स्वीकार किया कि स्त्री-पुरुष समानता न सिर्फ सही दिशा में उठाया जाने वाला कदम है बल्कि टिकाऊ विकास और सभी के कल्याण के लिए भी सबसे भरोसेमंद मार्ग है। इस वर्ष का जनसंख्या दिवस विश्व स्तर पर आह्वान करता है कि काहिरा आईसीपीडी सम्मेलन के अधूरे काम को पूरा किया जाए।
मातृत्व मृत्यु दर और अनापेक्षित गर्भधारण को कम करने के बावजूद कई चुनौतियां बनी हुई हैं। दुनिया भर में हम आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं सहित महिला अधिकारों पर जोर दे रहे हैं। गर्भावस्था से संबंधित समस्याएं अब भी 15 से 19 वर्ष की लड़कियों की मृत्यु का प्रमुख कारण हैं। लिंग आधारित हिंसा जिसका कारण स्त्री-पुरुष असमानता है, भयावह स्थिति तक पहुंच चुकी है।
नवंबर में काहिरा सम्मेलन की 25वीं वर्षगांठ पर नैरोबी में एक शिखर सम्मेलन होगा। मैं सदस्य देशों से कहना चाहूंगा कि वे अधिक से अधिक संख्या में उसमें भाग लें। मैं उन्हें इस बात के लिए भी प्रोत्साहित करना चाहूंगा कि वे आईसीपीडी के कार्रवाई कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए दृढ़ राजनीतिक और वित्तीय प्रतिबद्धताएं जताएं।
आईसीपीडी की सोच को आगे बढ़ाने से उन लोगों को भी अवसर मुहैय्या होंगे जो किसी न किसी मामले में पिछड़ गए हैं। इसके अतिरिक्त इससे सभी के लिए स्थायी, न्यायसंगत और समावेशी विकास का मार्ग भी प्रशस्त होगा।

Sunday, June 23, 2019

विधवा महिलाओं के उदास और कठिन जीवन के लिए उठायें आवश्यक कदम

23 जून 2019 अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस विशेष 
 जिन देशों में अच्छी पेंशन है वहां भी इनको निर्धनता का सामना  
अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस हमें उन आर्थिक कठिनाइयों और बढ़ती संवेदनशीलता पर विचार करने पर विवश करता है जिनका सामना ये शोक संतप्त महिलाएं कर रही हैं।
Image Courtesy: A Widow's Heart
सामाजिक और कानूनी संरक्षण के अभाव में इन विधवा महिलाओं की जीवन भर की कमाई और बचत अक्सर गरीबी से संघर्ष के लिए अपर्याप्त होती हैं। जिन देशों में अच्छी पेंशन प्रणाली है, वहां भी इन महिलाओं को वृद्धावस्था पुरुषों के मुकाबले निर्धनता का सामना अधिक करना पड़ता है। वृद्ध विधवाओं के लिए विशेष रूप से सामाजिक सेवाएं अधिक महत्वपूर्ण हैं जो अकेली रह जाती हैं या जिन्हें वृद्धावस्था में देखभाल सेवाओं की ज्यादा जरूरत पड़ती है।
अनेक देशों में महिलाओं को पुरुषों के समान पैतृक अधिकार नहीं हैं। इसका अर्थ यह है कि उन्हें अक्सर ज़मीन, संपत्ति और अपने खुद के बच्चों के जीवन से बेदखल कर दिया जाता है। जिन देशों के क़ानूनों में महिलाओं-पुरुषों के बीच भेदभाव नहीं किया जाता, वहां भी व्यवहार में महिलाएं पुरुषों की तरह अपने अधिकारों का उपयोग नहीं कर पातीं।
इसके अतिरिक्त कुछ समाजों में विधवाओं को यौन शोषण एवं उत्पीड़न या जबरन विवाह, दुर्व्यवहार और हिंसा का शिकार बनाया जाता है। इन परिस्थितियों को बदला जाना चाहिए और उन नियमों में भी परिवर्तन किया जाना चाहिए जोकि ऐसी भेदभावकारी रीतियों और हिंसा का समर्थन करते हैं।
संघर्ष और प्राकृतिक आपदाओं में विधवाओं की स्थिति और गंभीर हो जाती है। ऐसी स्थितियों में विधवाओं की संख्या बढ़ती है, क्षति एवं विस्थापन के कारण वे अधिक संवेदनशील स्थिति में आती हैं और सामाजिक एवं कानूनी संरक्षण अक्सर कमज़ोर पड़ जाते हैं।
आइए, इस अंतरराष्ट्रीय दिवस पर सभी विधवाओं को सहयोग देने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराएं- भले ही उनकी उम्र कोई भी हो, वे किसी भी स्थान पर रहती हों या किसी भी कानूनी प्रणाली के दायरे में आती हों। आइए यह सुनिश्चित करें कि वे किसी से न पिछड़ें।

Monday, December 29, 2014

'वो एक माँ थी"

Posted on Sunday 28 December 2014
दिल को झंकझोर देने वाली हकीकत का खूबसूरत बयान ध्यान से पढ़िए 
कहानी पढ़ते समय दिल के साथ दिमाग को भी काम मेँ लेँ ।
===================
राजेश और उसकी बीवी प्रिया एक मित्र

के यहाँ पर्व मनाकर अपने गाडी से
घर वापस लौट रहे थे।
काफी रात हो चुकी थी ।और
बारिश
की वजह से राजेश बहुत
धीमी गती से
गाड़ी चला रहा था।
तभी अचानक बिजली गीर गई।
बिजली के
रोशनी मे राजैश को गाड़ी के सामने कुछ
दिखाई दिया
तो उसने गाड़ी रोक दी।गाड़ी रुक ने
पर उसकी बीवी ने
कहा क्या हूवा गाड़ी क्यों रोक दी?
राजेश ने आगे कि ओर इशारा किया।
प्रिया ने आगे देखा तो वो डर गयी।
क्यों की
गाड़ी के सामने एक औरत
खड़ी थी।
वो औरत गाड़ी के पास आयी।
और हाथ से गाड़ी का शीशा नीचे
करने
का इशारा करने लगी।
राजेश
की बीवी प्रिया काफी डर
गयी थी।
उसने राजेश को गाडी चलाने को कहा।
लेकिन गाड़ी भी स्टार्ट
नही हुईं।
गाड़ी के बाहर खडी औरत बारिश
की वजह
भीग गयी थी। वो हाथ जोडकर
गाड़ी का शिशा निचे करने
का इशारा कर रही थी।
राजेश को लगा कि वो औरत किसी मुसीबत मे
है। इसलिए उसने गाड़ी का शिशा निचे
किया।
वो औरत हाथ जोडकर बोली
'भाई साहब
मेरी मदत किजीऐ।
तेज बारिश कि वजह से मेरे
गाड़ी का अॅक्सीटेंड हुआ है।
मेरी गाड़ी रस्ते के निचे गीर
गयी है।
उसमें मेरा छोटा बच्चा है।प्लिज
उसे बचाईये।
राजेश गाड़ी से उतरा और उस औरत के
पिछे गया।
उस औरत की गाड़ी रस्ते के
काफी निचे
गिर गयी थी।
अजय निचे उतरकर उस गाडी मे से
रो रहे उसके बच्चे को बाहर निकाला।
फिर राजेश को लगा की ड्रायवर
की सीट पर
भी कोई है।
जब राजेश ने ड्रायव्हर
की सीट पर देखा तो उसके होश उड गये।
क्योंकी ड्रायव्हर के सीट पर
वही औरत खून से लथपत
मरी पडी थी।
राजेश को अब सब समझ मे आया।
वो बच्चे को लेकर अपने गाड़ी के पास
आया।
बच्चे अपने बीवी प्रिया के पास
दिया।
उसकी बीवी बोली 'वो औरत
कहा है?'वह
कौन थीं? '
राजेश बोला
"वो एक माँ थी"

Tuesday, December 3, 2013

Beautiful Young Chinese Girls Executed


Uploaded on Aug 9, 2011
10 tragic stories of young girls sentenced to death and killed in the past years. Pictures show the last moments of the short lives of the girls.

AND TO ALL OF YOU HATERS WHO ATTACK AND INSULT ME, I FOUND THE ENTIRE CONTENT OF THIS VIDEO ON A CHINESE WEBSITE. I THOUGHT THE STORIES ARE INTERESTING AND SO I MADE THIS VIDEO TO SHARE THOSE STORIES WITH YOU GUYS. OF COURSE I DONT DEFEND CRIMINALS BUT AS I AM A WARM HEARTED HUMAN BEING I STILL FEEL SAD FOR YOUNG PEOPLE BEING CAPITAL PUNISHED REGARDLESS OF WHAT THEY DID. AND
I NEVER EVER MENTIONED ANYTHING LIKE THAT THOSE GIRLS SHOULD BE TREATED DIFFERENTLY THEN UGLY GIRLS/MEN/ETC.

Please keep that in mind before you comment stupid things!
Thanks for watching anyway!