src='https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js'/> वीमेन स्क्रीन : ज़िंदा है शिव भावना: ज़हर पी कर भी अमृत बांटना

Saturday, February 27, 2021

ज़िंदा है शिव भावना: ज़हर पी कर भी अमृत बांटना

मोरक्को मूल की एक फ्रांसीसी महिला लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन का कमाल 


26 फरवरी 2021//
शांति और सुरक्षा 

वक़्त के साथ ज़ख्म तो भर जाते हैं लेकिन दर्द कम नहीं होता। इस हकीकत  के बावजूद कई इंसान सामने आते हैं दर्द को ही दवा बनाने का चमत्कार कर दिखाया। मोरक्को मूल की एक फ्रांसीसी महिला लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन को, युवाओं में अतिवाद का मुक़ाबला करने प्रयासों में, असाधारण साहस दिखाने के लिये पुरस्कृत किया गया है, जिनका बेटा, लगभग एक दशक पहले, एक आतंकवादी हमले में मौत के मुँह में धकेल दिया गया था।  ये महिला अपने इस अथाह दुख को, ’प्रेम की पुकार’ से भरने की कोशिशों में सक्रिय हैं। पुरस्कार ऐसे लोगों  करने की है। इन राहों पर कदम बढ़ाने की हिम्मत मिलती है ऐसे इंसानों के बारे में पढ़ सुन कर। संयुक्त राष्ट्र समाचारों के बहादुर महिला की चर्चा हो रही है। 

 गौरतलब है कि लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन को मानव बन्धुत्व के लिये ज़ायद पुरस्कार से संयुक्त रूप से सम्मानित किया गया है. उन्हें ये पुरस्कार, फ़रवरी 2021 के आरम्भ में, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश के साथ मिला है।

उल्लेखनीय है कि लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन का 30 वर्षीय बेटा इमाद, फ्रांसीसी सेना में, एक पैराट्रूपर था। मानवता को बचने के लिए अपनी डयूटी करता हुआ एक सैनिक।  था कि आतंकवादी उसकी अभियान को लेकर सक्रिय हैं उसमें उसकी हत्या भी है। 

आखिर वह मनहूस समय आ गया जब उसका सामना मौत से होना था। मार्च 2012 में, फ्रांस के दक्षिणी हिस्से में, एक आतंकवादी मोहम्मद मेराह ने, नौ दिनों तक चलाए गए अपने हत्याअभियान में, 7 लोगों को मौत के मुँह में धकेल दिया था, लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन का बेटा इमाद भी जान गँवाने वालों में था। सदमा बहुत बड़ा था। सम्भलना नामुमकिन था लेकिन इस बहादुर औरत ने कमाल की हिम्मत दिखाई। नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया। उसने दर्द की  लिया। जिस आतंकवाद से इतना बड़ा सदमा मिला था उसके खिलाफ शांति और सहनशीलता का  लिया। 

लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन ने अपने बेटे इमाद की मौत के, लगभग एक महीने के भीतर ही, ‘इमाद एसोसिएशन फ़ॉर यूथ एण्ड पीस’ की स्थापना कर डाली. ये संगठन सहनशीलता और शान्ति को बढ़ावा देता है। आतंकवाद की सोच के खिलाफ यह बहुत बड़ा कदम था। सचमुच एक बहादुरी भरा कदम। हिंसा करने वाले दिलों पर शांति की बरसात। अमन के सौहार्द भरे अमृत  की बौछार। 

शुरुआत छोटी सी थी। व्यक्तिगत प्रयास जैसी। इसके बावजूद इसे तेज़ी से समर्थन मिलने लगा। उसके बाद से तो लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन ने युवाओं को विद्रोही और अतिवादी बनने से रोकने के लिये, फ्रांस में और विदेश में, परिवारों और समुदायों के साथ मिलकर काम किया है. इन प्रयासों के तहत वो, शान्ति, सम्वाद और आपसी सम्मान का पैग़ाम फैला रही हैं। दुनिया भर में उसकी चर्चा हो रही है। आतंक और हिंसा के गहन अँधेरे में यह बहादुर औरत रौशनी की एक किरण बन कर उभरी है। भटके हुए लोगों को रास्ता दिखाती हुई दिव्य सोच वाली बहादुर औरत। 

वास्तव में यह घटनाक्रम बेहद कठिन राहों पर एक दुखी मां का सफ़र था। लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन ने, यूएन न्यूज़ अरबी भाषा के सहयोगियों के साथ बातचीत में याद करते हुए हुए बताया कि उन्होंने किस तरह उस शहर ताउलाउज़ की यात्रा की, जहाँ उनके बेटे इमाद की हत्या की गई थी, दुख का पहाड़ टूट पड़ने की वजह तलाश करने की ख़ातिर। अपने ही ज़ख्मों को स्वयं कुरेदने जैसी थी यह यात्रा। 

जब उसने अपने बेटे का खून देखा तो वे पल बेहद दर्द थे भरे थे जिसका अहसास खून बहाने वालों को हो ही नहीं  सकता। लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन बताती हैं, “मैंने अपने घुटनों पर झुककर देखने की कोशिश की. मुझे ज़मीन पर उसका (अपने बेटे का) रक्त पड़ा हुआ नज़र आया। मैंने अपने हाथों में मिट्टी भरी और अपने बेटे के रक्त को रगड़ते हुए, दुआ माँगी, ‘ओ मेरे ख़ुदा, मेरी मदद कर, या मेरे ख़ुदा.’ मैं दहाड़ मारकर चीख पड़ी।”

दर्द का पहाड़ उस पर टूट पड़ा था। आंसूओं का एक सैलाब अंतर्मन  से आंखों के ज़रिए बाहर आ रहा था। दुख और सदमे का सामना कर रही इस माँ का दर्द उस समय तब और बढ़ गया जब उन्होंने ये देखा…वे पल आज भी आँखों को भिगो देते हैं।  इन भीगी आंखों में आंसू और दिल में दर्द ही दर्द लेकर वह उस इलाके में भी पहुंची जहां कभी उसके बेटे के हत्यारे का निवास रहा था। 

लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन ताउलाउज़ शहर की पूर्वोत्तर बस्ती लेस इज़ार्द्स में थीं, जहाँ उनके बेटे के हत्यारे ने परवरिश पाई थी, और जहाँ एक पुलिस कार्रवाई में, उस हत्यारे के जीवन का भी अन्त हो गया था। लेकिन लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन इस सब से अनजान थी। 

इस लिए लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन ने, वहाँ रास्तों पर यूँ ही भटक रहे या समय काट रहे कुछ युवाओं को देखा तो उनके पास जाकर पूँछा कि मोहम्मद मेराह कहाँ रहता था। उसका सवाल सुन कर वे लोग हैरान थे। उनकी आंखों और  चेहरे पर अजीब सी रहस्यमय  मुस्कान उभर आती। 

अजीब सी स्थिति थी। उन युवाओं में से एक ने, कुछ रहस्यमयी मुस्कान दिखाई, तो लतीफ़ा को ख़ुद पर ही कुछ अचरज हुआ कि उनके सवाल में क्या कोई अजीब बात थी। 

अल्पकाल के लिए रुकी हुई बात को आगे बढ़ाते हुए “उस युवा ने कहा, ‘लेकिन क्या आप टेलीविज़न नहीं देखती हैं? मैडम, क्या आप अख़बार नहीं पढ़ती हैं? मैंने कहा, कृपया, मैं पूछ रही हूँ कि मोहम्मद मेराह कहाँ रहता था? उसने मुझे बताया: मोहम्मद मेरा एक शहीद है. इस्लाम का एक हीरो. उसने फ्रांस को घुटनों पर झुका दिया!’”

यह सब आसान नहीं था लेकिन दुख तकलीफ़ से निकलकर ही आगे बढ़ा जा सकता था। इस बहादुर औरत ने  यही किया। 

आतंक के दिन याद आते ही आज भी दर्द जाग उठता है। मोहम्मद मेराह के क़ातिलाना वहशीपने ने देश को हिलाकर रख दिया था। उसने ताऊलाउज़ शहर और पास के माउंटाउबन में अन्धाधुन्ध गोलियाँ चलाकर जिस पहले व्यक्ति को मौत के मुँह में धकेला, वो इमाद इब्न ज़ायतेन ही था। मोहम्मद मेराह ने वर्ष 2012 में 11 से 19 मार्च तक ये गोलीबारी की थी। उसने कितने ही घरों के चिराग बुझा दिए। 

न जाने कितने घरों में अँधेरा किया उसने। उसके वहशीपने का शिकार होने वालों में दो अन्य सैनिक थे जो उस समय ड्यूटी पर नहीं थे. एक यहूदी स्कूल में एक रब्बाई (यहूदी धार्मिक प्रचारक या शिक्षक) और तीन बच्चे भी मोहम्मद मेराह की गोलियाँ का शिकार हुए. पाँच लोग घायल भी हुए थे। 

इमाद इब्न ज़ायतेन की ही तरह, मोहम्मद मेराह भी, एक आप्रवासी परिवार का बेटा था. लेकिन इन आप्रवासी परिवारों में से एक के बेटे (इमाद) ने देश की सेवा करने का रास्ता चुना, जबकि दूसरे परिवार के बेटे (मोहम्मद मेराह) ने आतंकवाद की राह पकड़ी।  


लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन इसकी वजह पर ध्यान खींचते हुए कहती हैं, “दुख के साथ कहना पड़ता है कि कुछ युवाओं के पास शिक्षा नहीं है, उन्हें माता-पिता की मौजूदगी नहीं मिली है, उन्हें कोई मददगार और सहारा देने वाला माहौल नहीं मिला है।” इस लिए शिक्षा और रहनसहन दोनों की तरफ ध्यान देना होगा। 

इसके साथ ही उन्होंने आगे कहा कि ये युवा भटके हुए हैं और हमें उन्हें सही रास्ते पर लाना है, हमें उनके साथ मिलकर काम करना ही होगा। शायद यही है एकमात्र मार्ग। 

“हमें इन युवाओं के साथ सम्पर्क और सम्वाद स्थापित करना ही होगा, क्योंकि वो ही तो भविष्य हैं।”

सहनशीलता का सन्देश देने के लिए लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन ने ये काम उस संगठन के माध्यम से करने का बीड़ा उठाया है जो उनके दिवंगत बेटे के नाम पर बनाया गया है। यह संगठन  सक्रिय। है। 

इसी मिशन को लेकर वो फ्रांस में अनेक इलाक़ों का दौरा करके, सहनशीलता का सन्देश फैला रही हैं। वो हाई स्कूलों के छात्रों, अभिभावकों और अन्य लोगों तक पहुँचकर, अपनी बात कह रही हैं। इनमें बहुत से अध्यापक और जेलों के निदेशक भी हैं जो उनके पास ये सन्देश फैलाने का अनुरोध लेकर आते हैं। इस संगठन के कार्य तेज़ी से बढ़ते जा रहे हैं। 

इस यादगारी अवसर पर यूएन प्रमुख एंतोनियो गुटेरेश ने भी ये पुरस्कार संयुक्त रूप से स्वीकार करते हुए एक वक्तव्य में, 5 बच्चों की माँ लतीफ़ा इब्न ज़ायतेन के प्रयासों को सराहा। उन्होंने कहा कि लतीफ़ा ने, अत्यन्त गम्भीर निजी सदमे से उबरकर, युवा लोगों को सहारा व समर्थन देने और आपसी समझदारी को बढ़ावा देने के समर्पित प्रयासों की बदौलत, देश-दुनिया में, वाह-वाही बटोरी है। उसके प्रयासों से बहुत से लोगों ने प्रेरणा पाई है। अमन शांति का यह काफिला दिन प्रति दिन मज़बूत होता जा रहा है। 

सुन्दर सपने देखें-इससे शक्ति मिलेगी। सुंदर सपनों  को देखना भी शक्ति अर्जित  करने जैसा ही है।  लतीफ़ा ने एक ऐसे युवा के साथ अपनी मुलाक़ात को याद किया जिसने कहा था कि वो एक ऐसी धरती पर भी उपेक्षित और अलग-थलग महसूस करता है जिसका नारा ही स्वतन्त्रता, समानता और बन्धुत्व है। लतीफ़ा ने उस युवक से कहा कि वो किस तरह एक बन्धुत्व वाले और सामुदायिक फ्रांस का निर्माण करने का सपना देखती हैं, जहाँ हर किसी के लिये अपनी एक जगह हो। इसी धरती  को स्वर्ग बनाने के प्रयासों में तेज़ी लानी होगी। 

युवाओं को आतंकवाद  के जाल में फंसने से रोकना होगा। लतीफ़ा ने उस युवक को कुछ ऐसी सलाह भी दी ताकि वो, मोहम्मद मेराह की तरह, अतिवाद के जाल में ना फँस जाएँ। 

लतीफ़ा ने कहा, “अपने हालात का पन्ना पलटने की कोशिश करो, पढ़ाई करो. किसी ख़ूबसूरत चीज़ के बारे में कोई सपना देखो... और जब तुम इबादत करो, तो अमन-चैन के लिये दुआ माँगो; मुहब्बत की दुआ.”

(जानकारी एवं तस्वीरें संयुक्त  राष्ट्र समाचार से साभार  Input- वीमेन स्क्रीन डेस्क डेस्क)

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